रविवार, 17 दिसंबर 2006

देवरिया जनपद : सच्चे लोकहितैषी

देवरिया कई जननायकों की कर्मस्थली रही है । ये जननायक तो अपने समय में पूरे राष्ट्र में छाए हुए थे पर देवरिया के प्रति इनका विशेष लगाव था । ये जननायक देवरिया के विकास के लिए कठिन तप किए और देवरिया जनपद की जनता को बहुत सारे कष्टों से निजात दिलाते हुए उनके लिए विकास का मार्ग प्रशस्त किए । आज भी देवरियाई जनता के हृदय में इन महापुरुषों के प्रति अपार आदर और प्रेम है ।
इन सच्चे लोकहितैषियों में जो नाम देवरिया की जनता जनार्दन के हृदय-पटल पर छा गया है, वह नाम है :-
बाबा राघवदास। इस लेख को आगे बढ़ाने के क्रम में मैं पूर्वान्चल के इस गाँधी को हृदय से नमन करता हूँ ।
आइए संक्षेप में इस महापुरुष की महानता को प्रणाम करें ।
बाबा राघवदास :-

बाबा राघवदास का जन्म १२ दिसम्बर १८९६ को पूणे (महाराष्ट्र) में एक संभ्रान्त ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री शेशप्पा और माता का नाम श्रीमती गीता था । इनके पिता एक नामी व्यवसायी थे ।
बाबा राघवदास के बचपन का नाम राघवेन्द्र था । राघवेन्द्र को बचपन में ही अपने परिवार से सदा के लिए अलग होना पड़ा क्योंकि राघवेन्द्र का हरा-भरा परिवार प्लेग जैसी महामारी की गाल में समा गया ।
१९१३ में १७ वर्ष की अवस्था में राघवेन्द्र एक सिद्ध गुरु की खोज में अपने प्रान्त को अलविदा कर दिए और प्रयाग, काशी आदि तीर्थों में विचरण करते हुए गाजीपुर (उत्तरप्रदेश का एक जनपद) पहुँचे जहाँ उनकी भेंट मौनीबाबा नामक एक संत से हुई । मौनीबाबा ने राघवेन्द को हिन्दी सिखाई । गाजीपुर में कुछ समय बिताने के बाद राघवेन्द बरहज (देवरिया जनपद की एक तहसील) पहुँचे और वहाँ वे एक प्रसिद्ध संत योगीराज अनन्त महाप्रभु से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए ।
१९२१ में गाँधीजी से मिलने के बाद बाबा राघवदास स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए तथा साथ ही साथ जनसेवा भी करते रहे । स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस कर्मयोगी को कई बार जेल की हवा भी खानी पड़ी पर माँ भारती का यह सच्चा लाल विचलित न होते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ अपना कर्म करता रहा । १९३१ में गाँधीजी के नमक सत्याग्रह को सफल बनाने के लिए राघवबाबा ने क्षेत्र में कई स्थानों पर जनसभाएँ की और जनता को सचेत किया ।
बाबा देवरियाई जनता के कितने प्रिय थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि १९४८ के एम.एल.ए. (विधायक) के चुनाव में उन्होंने प्रख्यात शिक्षाविद्ध, समाजसुधारक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आचार्य नरेन्द्र देव को पराजित किया ।
बाबा राघवदास ने अपना सारा जीवन जनता की सेवा में समर्पित कर दिया । उन्होंने कई सारे समाजसेवी संस्थानों की स्थापना की और बहुत सारे समाजसेवी कार्यों की अगुआई भी ।
१५ जनवरी १९५८ को माँ भारती का यह सपूत, जनता का सच्चा सेवक अपनों से विदा लेकर ब्रह्म में विलीन हो गया । बोलिए बाबा राघवदास की जय । भारत माता की जय ।

-प्रभाकर पाण्डेय

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

पाणेजी आपने बहुत ही बढ़िया काम किया है

yogi ने कहा…

Pandey ji,

Is baat ki jaankari mujhe nahi thhi, aur is disha mein aapka prayas bahut achha hai. Bahut kuch seekne ko mil raha hai....

Dhanyawad,
Yogi

kk yadav ने कहा…

देवरहा बाबा की जय ।