कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे भारत और विश्व के कुछ अन्य देशों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कहीं रासलीला का आयोजन होता है तो कहीं बाल-कृष्ण की झाँकी निकाली जाती है। कहीं-कहीं भजन-कीर्तन का आयोजन होता है तो कहीं-कहीं मेलों में देव-देवी की मूर्तियों से पंडाल सजाए जाते हैं। इस प्रकार एक बहुत ही आध्यात्मिक और सौहार्दपूर्ण माहौल का निर्माण हो जाता है।आइए इस पावन अवसर पर मैं आप महानुभाओं को देवरिया लिए चलता हूँ और देखते हैं कि इस जनपद में कृष्ण-जन्माष्टमी मनाने का स्वरूप कैसा है? देवरियाई जनता क्या-क्या करती है इस अवसर पर.....।
देवरिया के हर थाने, कोतवाली आदि में कृष्ण जन्माष्टमी का समारोह बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इन स्थानों को सजाया जाता है। बाल कृष्ण की झाँकी लगाई जाती है। नृत्य-गायन, भजन-कीर्तन आदि रातभर चलते रहते हैं।
शहरों, कस्बों आदि में जगह-जगह देव-देवी विशेषकर माखनचोर की मूर्तियों को पंडाल में सजाया जाता है और रातभर मेला चलता रहता है। लोगों का हजूम उमड़ता है और भगवान के दर्शन करते हुए मेले का आनन्द उठाता है।
तो अब आइए, थोड़ा ग्रामीण क्षेत्रों की ओर यानि गाँवों की भी सैर करें और देखें कि ग्रामीण जनता-जनार्दन जन्माष्टमी का त्योहार किस प्रकार मनाती है।
कृष्ण-जन्माष्टमी के दिन अधिकांश ग्रामवासी व्रत रखते हैं। यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चे भी श्रद्धा और उत्साह के साथ व्रत रखते हैं। कुछ बच्चे तो इस आशा में व्रत रखते हैं कि खूब फल, जैसे- सेब, केला आदि और रामदाना, दूध, दही आदि भरपूर मात्रा में खाने को मिलेगा।इन ग्रामीण क्षेत्रों में कृष्ण जन्माष्टमी को समारोह के रूप में मनाने की तैयारी सुबह जगते ही शुरु हो जाती है। बच्चों का काम फूल-माला आदि तैयार करना और तोरण बनाने के साथ-साथ आम के पल्लव, अशोक के पल्लव व केले के पौधे आदि एकत्र करना होता है। जवनका गोल (युवा वर्ग) बुढ़वा गोल (बुजुर्ग वर्ग) की देख-रेख में डोल (एक प्रकार का मंदिर जो कपड़े, रंगीन कागज आदि को एक छोटी चौकी के ऊपर लकड़ी आदि पर चिपकाकर बनाया जाता है) का निर्माण करते हैं। इस डोल को विभिन्न प्रकार के सजावटी सामानों से सजाया जाता है। फिर इस डोल को किसी के घर या मंदिर में रख देते हैं। डोल के अगल-बगल में तोरण आदि के साथ-साथ केले के पौधे, आम, अशोक, कनैल आदि की छोटी-छोटी पल्लवदार टहनियाँ लगाई जाती हैं। यह झाँकी बहुत ही मनमोहक होती है और एक अद्भुत, आध्यात्मिक आनन्द मन में कहीं हिचकोले लेने लगता है। साम होते ही इस डोल में बाल कृष्ण की मूर्ति या फोटो आदि के साथ अन्य देवी-देवता के फोटो भी रखे जाते हैं। दीपक, अगरबत्ती आदि जलाई जाती है। इस डोल के मध्य में एक खीरे आदि को फाड़कर उसमें कसैली (सुपाड़ी) आदि डालकर रख देते हैं। कीर्तनियाँ लोग कीर्तन गाना शुरु कर देते हैं और यह कीर्तन लगातार बारह बजे रात तक चलता रहता है जबतक भगवान का जन्म नहीं हो जाता। बारह बजते ही एक व्यक्ति डोल के पास जाकर सादर सुपाड़ी को खीरे में से निकालकर अलग रख देता है यानि भगवान का प्रकटीकरण। इसके साथ ही शंख, घंटे, ढोल, नगाढ़े आदि से पूरा वातावरण गूँजने लगता है। चारों तरफ भगवान कृष्ण की जय-जयकार सुनाई देती है। भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला... के बाद कीर्तनिया गोल यह कीर्तन,
"आठो हो बजनवा, जसोदा घर बाजे,
जसोदा घर बाजे, जसोदा घर बाजे, नंद घरे बाजे, आठो हो बजनवा, जसोदा घर बाजे।
जब जनम लिए बनवारी, तब खुली गइली जेल के केवारी (किवाड़),
देवकी अउरी बसुदेव के खुली गइल हाथ के बधनवा, हो हाथ के बधनवा,
जसोदा घर बाजे, जसोदा घर बाजे, नंद घरे बाजे, आठो हो बजनवा, जसोदा घर बाजे........। "
गाते हैं। इसके बाद आरती होती है और प्रसाद बाँटा जाता है। प्रसाद की मात्रा बहुत ही अधिक होती है क्योंकि बहुत सारे श्रद्धालु अपने-अपने घर से मनभोग (आटे को घी में भूनकर चीनी, सूखे फल आदि मिलाकर बनाया हुआ प्रसाद), पंजीरी (धनिया को भूनकर, पीसकर उसमें चीनी, मेवे आदि मिलाकर बनाया हुआ प्रसाद), चनारमृत (पंचामृत) और फलों को काटकर लाते हैं और ये सभी प्रसाद लोगों में बाँटे जाते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद सभी लोग अपने-अपने घर चले जाते हैं पर एक जरूरी बात यह है कि एक या दो लोग डोल के पास ही नीचे सोते हैं और दीपक में बराबर तेल-बत्ती करते रहते हैं ताकि अक्षय-दीप बराबर जलता रहे।
उस दिन से लगातार हर रात को भजन-कीर्तन का सिलसिला शुरु हो जाता है और आरती के बाद प्रसाद वितरण होता है।
पाँचवें, सातवें, नौवें या ग्याहरवें दिन इस डोल को पूरे गाँव में घूमाया जाता है। डोल के पीछे-पीछे कीर्तनिया गोल कीर्तन-भजन करते हुए चलता है और कुछ लोग डोल के साथ-साथ मनभोग, पंजीरी, पंचामृत आदि प्रसाद लेकर चलते हैं और दर्शनार्थियों को बाँटते हैं। यह डोल प्रत्येक घर में जाता है और उस घर के सभी लोग बाल कृष्ण के दर्शन करते हैं और श्रद्धापूर्वक कुछ दान-दक्षिणा चढ़ाते हैं। पूरे गाँव में डोल को घूमाने के बाद आरती करके विसर्जन कर दिया जाता है।
और हाँ जो भी चढ़ावा चढ़ता है उसको गिनकर किसी के घर पर रख दिया जाता है और अगले साल वह व्यक्ति कुछ और रुपए मिलाकर वापस करता है। इस पैसे से डोल के सामान के साथ-साथ वाद्य-यंत्र आदि खरीदे जाते हैं।
।।हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
बोलिए कृष्ण भगवान की जय।
-प्रभाकर पाण्डेय
शुक्रवार, २९ अगस्त २००८
देवरिया जनपद की कृष्ण-जन्माष्टमी
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
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9:50 अपराह्न
9
टीका-टिप्पणी
बुधवार, ६ अगस्त २००८
नाग पंचमी : देवरिया जनपद में
[नागपंचमी भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न तरीकों से मनाई जाती है। पर साँप (नाग बाबा-नेताबाबा-सफेदपोश बाबा और बाबा) को दूध पूरा भारतीय जनमानस सदियों से पिलाता आ रहा है और इस त्योहार में भी ये ही एकरूप है।]
आइए, हम आप को नागपंचमी त्योहार के शुभ अवसर पर देवरिया लिए चलते हैं ताकि आप देख सकें कि इस जनपद की ग्रामीण जनता नागबाबा को दूध पिलाने के साथ-साथ और क्या-क्या करती है।
नागपंचमी के दिन बहुत जल्दी जगना पड़ता है। बहुत सारे लोग-लइका तो भिनसारे ही जग जाते हैं। वैसे ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को छोड़कर बाकी सभी लोग बहुत ही जल्दी जग जाते हैं। किसी को गाय-बैल को सानी-पानी करना होता है तो किसी को हल-बैल लेकर खेतों में जाना होता है।
इस दिन जल्दी जगने से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि गाय का दूध आसानी से मिल जाता है और इस दिन दूध की व्यवस्था विशेषकर घर के बच्चे ही करते हैं। बच्चे नागपंचमी के एक दिन पहले ही पता लगा लेते हैं कि गाँव में किसके-किसके घर लगहर (दूध देनेवाली) गाय है और नागपंचमी के दिन बहुत सुबह ही ७-८ लोटा-गिलास लेकर दूध लाने निकल पड़ते हैं और जिसके-जिसके घर पर लगहर गाय होती है उनके-उनके घर पर एक-एक बरतन रख देते हैं।इस दिन लोग गाय का दूध बेचते नहीं अपितु थोड़ा-थोड़ा कर के सभी को दे देते हैं। और अब आप समझ ही गए होंगे कि अगर ७-८ जगह से १०० -१०० ग्राम दूध भी मिल जाता है तो दूध-लावा चढ़ाने के लिए पर्याप्त होता है।
दूध की व्यवस्था करने के बाद एक थाली में गाय के गोबर को बालू और सरसों से किसी पंडित या जानकार व्यक्ति द्वारा परोरवाया (अभिमंत्रित) जाता है। और इसी गोबर से घरों में जगह-जगह नागबाबा के चिह्न बनाए जाते हैं और पूरे घर पर लाइन खींची जाती है।
औरतें जल्दी-जल्दी नहा-धोकर धान का लावा बनाती हैं और घर में गोबर द्वारा बनाए हुए नागबाबा के चिह्नों पर दूध और लावा चढ़ाती हैं। इसके बाद घर का ही कोई व्यक्ति दूध में लावा मिलाकर गाँव के सभी देवलों (देव-स्थानों), सभी खेतों, बगीचों आदि में चढ़ाता है।
इस दिन घर में तरह-तरह के पकवान जैसे खीर-पूड़ी आदि भी बनाई जाती है। १०-११ बजे गाँव के सभी लोग-लइका किसी बगीचे या मैदान में इकट्ठा होते हैं और शुरु होते हैं तरह-तरह के खेल; जैसे- कबड्डी, घोड़-कबड्डी, लंबी कूद, ऊँची कूद, चौपड़िया, चिक्का, दौड़, कबड्डी, कुश्ती आदि। इन खेलों में भाग लेना बहुत ही आनन्ददायक और यादगार होता है क्योंकि इसमें बाप-दादा सभी लोग भाग लेते हैं। एक बात और जो मुझे आज भी याद है और सदा-सदा याद रहेगी वह यह कि इन खेलों में बहुत बड़े पैमाने पर गलगोदही (खेल के नियम न मानना या झूठ बोलना) होती है और जिसके कारण कोई खिलाड़ी जल्दी मरता नहीं है और खेल घंटों तक चलता रहता है।
खेल खेलने के बाद सभी लोग घर पर आते हैं और पकवानों का आनन्द उठाते हैं।
-प्रभाकर पाण्डेय
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
at
12:25 अपराह्न
12
टीका-टिप्पणी
बुधवार, २५ जून २००८
देवरिया जनपद में अभिवादन एवं आशिर्वाद का ढंग एवं उसके लिए प्रयुक्त भोजपुरी शब्द, वाक्यांश आदि
यहाँ देवरिया जनपद और उसके आस-पास के क्षेत्रों में अभिवादन के तरीकों एवं अभिवादन और आशिर्वाद के लिए प्रयुक्त होनेवाले भोजपुरी शब्द, वाक्यांश आदि हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या के साथ दिए जा रहे हैं। अभिवादन के ये ढंग, शब्द, वाक्यांश आदि एक दूसरे के प्रति श्रद्धा, आदर, प्रेम आदि के साथ ही साथ भोजपुरी सभ्यता, रहन-सहन एवं माटी की प्रेम सनी खुशबू को व्यक्त करते हैं।
भोजपुरिया समाज में अभिवादन करते समय झुकने की प्रथा है। झुकने मात्र से ही सामनेवाले के प्रति हमारा सम्मान, श्रद्धा, प्रेम आदि प्रकट हो जाता है और सामनेवाले के हृदय में भी हमारे प्रति प्रेम एवं मंगल की भावना पल्लवित हो जाती है।
भोजपुरिया समाज में भेंटने की प्रथा है। जब कोई महिला किसी दूसरी महिला से मिलती है तो गले मिलकर अँकवार देती है। अगर नई-नवेली दुल्हन है तो अपनी माँ, चाची, बुआ आदि को अँकवार देते समय रोती भी है, विशेषकर विदाई के समय। जब वह अपनी माँ को भेंटती है तो 'अरे हमार माई' या 'अरे हमार माई हो माई' या 'माई हो माई' इन वाक्यांशों में से किसी एक को बोलते हुए रोती है। इसी प्रकार अगर बुआ, चाची आदि को भेंटती है तो माई की जगह पर बुआ, चाची आदि का प्रयोग करती है। उसे रोता देख अन्य महिलाएँ भी रोने लगती हैं या कुछ आँखे नम कर लेती हैं और उसे बार-बार चुप कराने की कोशिश करती हैं।
अगर दुल्हन के मायके का कोई व्यक्ति उससे मिलने उसके ससुराल जाता है तो वह उन्हें भी भेंटती है। इस भेंटने में वह क्या करती है कि अपने पिता, भाई आदि का पैर पकड़कर रोती है और उसके पिता, भाई आदि नम आँखों से उसे चुप कराते हैं। ये अवसर प्रेम की, अपनत्व की पराकाष्ठा से सराबोर होते हैं।
आधुनिक युग में कुछ पढ़े-लिखे भोजपुरिया लोगों को यह सभ्यता गँवारू दिखती है जिसके कारण आधुनिकता के चक्कर में वे इससे दूर रहना ही पसंद कर रहे हैं।
आइए, अभिवादन और आशिर्वाद के कुछ विशेष पहलुओं से परिचित होते हैं:-
अभिवादन:- भोजपुरिया समाज में अभिवादन के दो तरीके हैं; या तो व्यक्ति चुपचाप बड़ों का चरण छूते हैं या झुककर अभिवादन करते हैं। इस समय अभिवादनकर्ता के मुँह से शब्द तो नहीं निकलते पर उसकी आँखों में और चेहरे पर सामनेवाले के प्रति अपार सम्मान, प्रेम आदि प्रत्यक्ष परिलक्षित होते हैं।
दूसरा तरीका है; झुककर या पैर छूते हुए कुछ अभिवादनीय शब्द, वाक्यांश आदि बोलना। जैसे:-
1. गोड़ लागीं। गोड़ लागतानी। पैर पड़तानी। पाँव पड़तानी। पाँव लागीं। (पैर पड़ता हूँ।)- यह अभिवादन अपने से बड़ों को किया जाता है।
2. दंडवत। दंडवत महाराज। (यह अभिवादन विशेषकर किसी साधू, महात्मा आदि को किया जाता है।)
3. जय राम जी की। (यह अभिवादन अपने बराबरीवालों को किया जाता है)।
4. नमस्कार। प्रनाम, परनाम (प्रणाम)।
आशिर्वाद:- आशीर्वाददाता भी अभिवादनकर्ता के मंगल एवं कल्याण के लिए या तो उसके सिर पर हाथ रखता है या हाथ उठाकर आशिर्वाद देता है या, और मंगलसूचक शब्द, वाक्यांश आदि व्यक्त करता है।
(क) सौभाग्यवती महिला को दिया जानेवाला आशिर्वाद:-
1. जोड़ा लागो (जोड़ा लगे) - यह आशिर्वाद उस सौभाग्यवती महिला को दिया जाता है जिसके अभी केवल एक ही पुत्र हो।
2. तहार बाबू अँचरे लागल रहें (आपका पुत्र आँचल से लगा रहे।)
3. तहार सुहाग बनल रहो (तुम्हारा सुहाग बना रहे।)
4. तहार सेनुर बनल रहो (तुम्हारा सिंदूर बना रहे।)
5. दूध अउरी पूत दुनू बनल रहो (दूध और पूत दोनों बना रहे।)
6. दूधो नहा पूतो फलS (दूध से नहाइए और पूत फलें।)
(ख) पारिवारिक महिला या पुरुष को दिया जानेवाला आशिर्वाद:-
7. तहार परिवार सुखी रहो (आपका परिवार सुखी रहे)।
8. लोग-लइका सब निमने रहें (बाल-बच्चे सब अच्छे रहें)।
9. लइका-फइका सब बनल रहें (बाल-बच्चे सब बने रहें)।
(ग) सबके लिए प्रयुक्त होने वाले आशिर्वचन:-
10. जुड़ाइल रहS (अच्छी अवस्था में रहिए।)
11. बनल रहS। निमने रहS। (हर तरह से अच्छी अवस्था में रहिए।)
12. भगवान तहके बनवले रहें। (भगवान आपको अच्छी अवस्था में रखें।)
13. चिरिनजीवी होखS। चीरींजी होखS। आयु लमहर होखे।(उम्र लंबी हो।)
14. गदाइल रहS। फुलाइल रहS। मोटाS। (हर तरह से अच्छी अवस्था में रहिए।)
15. गच्च रहS। खुस रहS। मस्त रहS। (प्रसन्न रहिए।)
16. कुछ लोग अभिवादन के प्रत्युत्तर में बोलते हैं:- बाबू। बाबू-बाबू। जय हो।
17. जीअS। जीअS-जीअS। (आपका जीवन सानन्द बीते।)
18. नाया धरS, पुराना खाS। (नया रखिए, पुराना खाइए- तात्पर्य यह है कि आपको किसी वस्तु की कभी भी कमी न खले।)
कुछ ग्रामीण सुहागिन महिलाएँ अपने से बड़ी महिलाओं का चरण अपने आँचल में लेकर दोनों हाथों से उठाकर अपने सिर से स्पर्श कराती हैं या हाथ में आँचल लेकर पैर छूती है। इसका तात्पर्त यह है कि ऐसा करने से सुख-समृद्धि उनके आँचल में आ जाती है।
-प्रभाकर पाण्डेय
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
at
8:12 पूर्वाह्न
10
टीका-टिप्पणी
सोमवार, २३ जून २००८
देवरिया में किसी संबंधी या रिस्तेदार के लिए प्रयुक्त भोजपुरी संबोधन
देवरिया और उसके आस-पास के क्षेत्रों में संबंधी या रिस्तेदार के लिए प्रयुक्त भोजपुरी संबोधन नीचे दिए जा रहे हैं। इन संबोधनों का प्रयोग गँवई जनमानस के साथ-साथ नगरी जनमानस भी बहुतायत से करता है। धीरे-धीरे इन शब्दों की जगह पर अंकल, आंटी, पापा, मंमी, डैडी, मॉम आदि शब्द भी प्रयुक्त होने लगे हैं पर भोजपुरी संबोधनों का अस्तित्व अभी भी बना हुआ है। ये भोजपुरी संबोधन अपनापन और मिठास से सराबोर हैं। बाबूजी (पिता के लिए संबोधन) कहने से जो अपनापन, प्रेम एवं सम्मान पिताजी के प्रति झलकता है वह पापा, डैड या डैडी कहने से नहीं। पापा, डैड या डैडी बनावटी लगते हैं और इनके उच्चारण में भी रूखापन और बनावटीपन झलकता है।
तो आइए अब भोजपुरी संबोधनों से परिचित होते हैं:-
ध्यान दें- भोजपुरी शब्दों के आगे कोष्टक में हिन्दी शब्द भी दिए गए हैं। यहाँ उन शब्दों को नहीं रखा गया है जो हिन्दी जैसे ही बोले जाते हैं । जैसे - मामा, मामी, नाना, नानी इत्यादि।
बाबूजी, बाबू, भइया (पिताजी)। माई (माँ)।
काका (चाचा)। काकी (चाची)।
मउसी (मौसी)। मउसा (मौसा)।
बाबा (दादा) - आजा भी बोलते हैं लेकिन आजा शब्द का प्रयोग दूसरा कोई जब किसी से किसी के दादा के बारे में बात करता है तो करता है- जैसे- तोहार आजा कहाँ बाने? (तुम्हारे दादा कहाँ हैं? इसी प्रकार दादी के लिए आजी का प्रयोग भी होता है)। इया (दादी)।
परपाजा (परदादा)। परपाजी (परदादी)।
फुआ (बुआ)। फूफा। सार (साला)। सारि (साली)। भउजी (भाभी)। भइया (बड़े भाई)।
मरद, बुढ़ऊ, मालिक (तहार मालिक काहाँ बाने- आपके पति कहाँ हैं?) (मर्द, पति)।
मेहरारू, मउगी, मेहरी, मलिकाइन (औरत, पत्नी) ।
पतोहिया (पतोहू)। दामाद, दमाद।
जीजा (बड़ी बहन का पति)। पहुना, पाहुन (किसी भी रिस्तेदार के लिए और दामाद के लिए भी)।
बहनोई।
देयादिन (पति के भाई की पत्नी) । देवरानी (देवर की पत्नी)।
ननदी, ननद (ननद) । ननदोई (नंदोई)
सरहज (साले की पत्नी)।
जेठ, जेठजी (पति के बड़े भाई)।
देवर, देवरू (देवर) ।
लइका, बेटवा, बेटउआ,लइकवा,बंस (लड़का,पुत्र)। लइकिनी, लइकी, बिटिया, बेटी, बबुनिया (लड़की, बेटी)।
बहिन, बहिनी (बहन)।
भइया (भाई)।
समधी। समधिनी, समधिआइन, समधिन (समधिन) ।
साढ़ू, सारू (पत्नी की बहन का पति) । सढ़ूआइन (साढ़ू की पत्नी) ।
नाती (पुत्र या पुत्री दोनों के बेटे के लिए)। नतिनी (पुत्र या पुत्री दोनों के बेटी के लिए)।
वैसे पुत्र के पुत्र या पुत्री के लिए पोता और पोती भी खूब चलता है।
पिता की भाभी के लिए बड़की माई, बड़की अम्मा तथा पिता के बड़े भाई के लिए बड़का बाबूजी प्रयुक्त होता है।
बड़े बेटे को बड़कू (जैसे- तोहार बड़कू कहाँ बाने? मतलब आपके बड़े बेटे कहाँ हैं?)
इसी प्रकार छोटे बेटे को छोटकू, मँझले बेटे को मझीलू, साझिल बेटे को सझीलू, बड़ी बेटी को बड़की, छोटी बेटी को छोटकी, मँझली बेटी को मझीली, साझिल बेटी को सझीली कहते हैं। छोटे बच्चों को बाबू से भी संबोधन करते हैं।
अपरिचित व्यक्ति जब किसी लड़के को बुलाता है तो मुन्ना या गुड्डू और किसी लड़की को बुलाता है तो मुन्नी , गुड्डी या बिटिया कह कर संबोधित करता है।
किसी भी बुजुर्ग के लिए काका, बाबा और महिला बुजुर्ग के लिए काकी, ईया आदि संबोधन प्रयुक्त होते हैं।
-प्रभाकर पाण्डेय
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
at
6:28 अपराह्न
4
टीका-टिप्पणी
मंगलवार, २७ मई २००८
तीन सौ एक भोजपुरी कहावतें हिंदी अनुवाद एवं अर्थ सहित।
प्रस्तुत हैं तीन सौ एक भोजपुरी कहावतें विशेषकर देवरियाई (देवरिया जनपद की) जनता द्वारा बोली जानेवाली।
ये कहावतें मैंने अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में सुनी हैं। ये कहावतें अभोजपुरी महानुभावों की समझ में भी आएँ, इसलिए प्रत्येक कहावत के नीचे उनका शब्दशः हिन्दी अनुवाद और व्याख्या भी दे दिया गया है।
इन कहावतों में भोजपुरिया समाज और माटी की महक है तथा है उनके चिंतन की पराकाष्ठा। ये कहावतें भोजपुरिया समाज की प्रतिबिम्ब हैं। पढ़िए और देखिए कि इन एक-एक पंक्तियों में कितना सार भरा हुआ है।
जय हिन्द।। जय भारत।।
1. लाठी कपारे भेंट नाहीं अउरी बाप-बाप चिल्ला।ये कहावतें मैंने अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में सुनी हैं। ये कहावतें अभोजपुरी महानुभावों की समझ में भी आएँ, इसलिए प्रत्येक कहावत के नीचे उनका शब्दशः हिन्दी अनुवाद और व्याख्या भी दे दिया गया है।
इन कहावतों में भोजपुरिया समाज और माटी की महक है तथा है उनके चिंतन की पराकाष्ठा। ये कहावतें भोजपुरिया समाज की प्रतिबिम्ब हैं। पढ़िए और देखिए कि इन एक-एक पंक्तियों में कितना सार भरा हुआ है।
जय हिन्द।। जय भारत।।
अनुवाद- लाठी सिर से लगी नहीं और बाप-बाप चिल्लाए।
अर्थ- नखरेबाजी।
2. धान गिरे बढ़ भाग,गोहूँ गिरे दुरभाग।
अनुवाद- धान गिरे बढ़ भाग्य, गेहूँ गिरे दुरभाग्य।
अर्थ- खेत में अगर धान की खड़ी फसल गिरती है तो धान की उपज अच्छी होती है लेकिन गेहूँ की फसल गिर जाए तो उपज अच्छी नहीं होती। यानि गिरी हुई धान की फसल के दाने निरोग और बड़े होते हैं जबकि गेहूँ गिर जाए तो उसके दाने छोटे-छोटे और सारहीन हो जाते हैं।
३. लाल,पीयर जब होखे अकास, तब नइखे बरसा के आस।
अनुवाद- लाल, पीला जब हो आकाशा,तब नहीं है वर्षा की आशा।
अर्थ- अगर आकाश का रंग लाल और पीला हो तो बारिश की संभावना नहीं होती।
४. खेती, बेटी, गाभिन गाय, जे ना देखे ओकर जाय।
अनुवाद- खेती,बेटी गाभिन गाय, जो ना देखे, उसकी जाए।
अर्थ- खेती,बेटी और गाभिन गाय की देख-रेख करनी पड़ती है। यानि अगर आप इन तीनों पर नजर नहीं रखेंगे तो आप को पछताना पड़ सकता है।
5. काछ कसौटी सांवर बान।
ई छाड़ि मति किनिह आन।
अर्थ- दो दाँत और भूरे रंग वाला बैल अच्छा माना जाता है।
6. चिरई में कउआ,मनई में नउआ।
अनुवाद- चिड़िया में कौआ,मनई में नउआ (हजाम)।
अर्थ- पक्षियों में कौवा और आदमियों में हजाम बहुत चतुर होते हैं।
7. बाढ़े पूत पिता की धरमा,
खेती उपजे अपनी करमा।
अर्थ- पिता के अच्छे कर्मों से पुत्र की
उन्नति होती है और अपनी मेहनत
से ही खेत में अच्छी पैदावार होती है।
8. निरबंस अच्छा लेकिन बहुबंस नाहीं अच्छा।
अनुवाद- निरवंश अच्छा लेकिन बहुवंश नहीं अच्छा।
अर्थ- संतान हो तो अच्छे गुण वाली,
नहीं तो हो ही न।
9. खड़ी खेती,गाभिन गाय,
तब जान जब मुँह में जाय।
अनुवाद- खड़ी खेती, गाभिन गाय,तब जानिए जब मुँह में जाए।
अर्थ- खड़ी फसल और गाभिन गाय का भरोसा नहीं होता यानि जबतक फसल कटकर खलिहान में न आ जाए तबतक उसके नष्ट होने की संभावना बनी रहती है और गाभिन गाय भी जबतक बच्चा न जन दे तबतक उसका भी भरोसा नहीं।
10. जइसन खाइ अन, वइसन रही मन।
अनुवाद- जैसा खाएँगे अन्न, वैसा रहेगा मन।
अर्थ- हम क्या खाते हैं,उसका प्रभाव आचरण और मनोवस्था पर भी पड़ता है।
11. पहीले दिन पहुना,दूसरे दिन ठेहुना,तीसरे दिन केहुना।
अर्थ- रिस्तेदारी में ज्यादे दिन रहने
से धीरे-धीरे इज्जत कम होने
लगती है।
12. बेटी के बेटा कवने काम,
खइहें इहँवा चेटइहें गाँव।
अनुवाद- बेटी के बेटा किस काम के, खाएँगे यहाँ जाएँगे अपने गाँव।
अर्थ- दूर रहनेवाले समय पर काम नहीं आते।
13. घोड़ा की पिछाड़ी अउरी हाकिम की
अगाड़ी कबो नाहीं जाए के चाहीं।
अनुवाद- घोड़ा की पीछे और अधिकारी के आगे कभी
नहीं जाना चाहिए।
अर्थ- घोड़ा के पीछे जाने पर उसके लात मारने का खतरा रहता है जबकि अपने से बड़े अधिकारी के आगे-आगे करने पर उसके क्रोधित होने की संभावना होती है।
14. बड़ संग रहिअ त खइहS बीड़ा पान,
छोट संग रहिअ त कटइहS दुनु कान।
अनुवाद- बड़ संग रहेंगे तो खाएंगे बीड़ा पान,छोट संग रहेंगे तो कटाएँगे दोनों कान।
अर्थ- सज्जन का संग अच्छा है जबकि दुष्टों
का संग करने से हानि होती है।
15. आपन इज्जत अपनी हाथे में हअ।
अनुवाद- अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है।
अर्थ- अपनी इज्जत हम खुद ही बना के रख सकते हैं।
16. अपनी गली में त एगो कुत्ता शेर होला।
अनुवाद- अपनी गली में एक कुत्ता भी शेर होता है।
अर्थ- अपने घर, गाँव, क्षेत्र आदि में सभी बहादुर होते हैं।
17. आपन भला त सब चाहेला।
अनुवाद- अपना भला तो सब चाहते हैं।
अर्थ- आदमी वही जो दूसरे के अच्छे की भी सोंचे केवल अपना ही नहीं।
18. कहले पर धोबिया गदहवा पर नाहीं चढ़ेला।
अनुवाद- कहने पर धोबी गदहा पर नहीं बैठता।
अर्थ- कुछ लोग कहने पर वह काम नहीं करते जबकि अपने मन से वही काम करते हैं।
19. बानर का जानी आदी के सवाद।
अनुवाद- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।
अर्थ- सब वस्तु की महत्ता सब लोग नहीं जानते।
२०. कुकुरे की पोंछी केतनो घी लगाव उ टेड़े के टेड़े रही।
अनुवाद- कुत्ते की पूँछ में कितना भी घी लगाइए,
वह टेड़ी की टेड़ी ही रहेगी।
अर्थ- प्रकृति नहीं जाती यानि स्वभाव बना रहता है।
21. गेहूँ की साथे घुनवो पिसाला।
अनुवाद- गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है।
अर्थ- साथ रहनेवाला भी लपेट में आ जाता है यानि अच्छा होते हुए भी बुरे के साथ रहने पर कभी-कभी बुरी संगति के कारण परेशानी खड़ी हो जाती है।
22. दुधारू गाइ के लतवो सहल जाला।
अनुवाद- दुधारू गाय का लात भी सहा जाता है।
अर्थ- जिस व्यक्ति से अपना फायदा हो अगर वह कुछ उलटा-पुलटा भी करे या बोले तो सहा जाता है।
23. हाथे में पइसा रहेला तब बुधियो काम करेले।
अनुवाद- हाथ में पैसा रहने पर बुद्धि काम करती है।
अर्थ- पास में पैसा रहने पर दिमाग अपने-आप चलता है।
24. पेटवे सब कुछ करावेला।
अनुवाद- पेट ही सबकुछ कराता है।
अर्थ- पेट के कारण ही जीव बुरे से बुरा काम भी करता है।
25. पेट कबो नाहीं भरेला।
अनुवाद- पेट कभी नहीं भरता।
अर्थ- दुनिया में सबकुछ भर सकता है केवल पेट को छोड़कर। यानि बिना खाए काम नहीं चल सकता।
26. करनी ना धरनी,धियवा ओठ बिदोरनी।
अनुवाद- करनी ना धरनी, बेटी ओठ विदोरनी (मुँह बनानेवाली)।
अर्थ- कुछ काम भी न करना और नखरे भी दिखाना।
27. जेतने सरी ओतने तरी।
अनुवाद- जितना सड़ेगा उतना तरेगा।
अर्थ- जितना पुराना उतना ही बढ़िया।
28. का राम की घरे रहले आ का
राम की बने गइले।
अनुवाद- क्या राम के घर रहने से या क्या राम के वन जाने से।
अर्थ- अनुपयोगी व्यक्ति। अयोग्य व्यक्ति।
२९. सब रामायन बीती गइल, सीता केकर बाप।
अनुवाद- सब रामायण खत्म हो गया, सीता किसकी बाप।
अर्थ- अच्छी तरह से समझाने के बाद भी उसी प्रकरण से संबंधित मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछना।
30. रो रो खाई,धो धो जाई।
अनुवाद- रो-रो खाएगा, धो-धो जाएगा।
अर्थ- भोजन सदा प्रसन्न मन से करना चाहिए। अप्रसन्न मन से किया हुआ भोजन शरीर को लाभ नहीं पहुँचाता।
31. भगवान के भाई भइल बारअ।
अनुवाद- भगवान के भाई बने हैं।
अर्थ- जब कोई काम करने में टालमटोल करता है या कहता है कि बाद में करूँगा तो कहा
जाता है। तात्पर्य यह है कि कोई भी काम कल पर नहीं टालना चाहिए।
32. भइंस पानी में हगी त उतरइबे करी।
अनुवाद- भैंस पानी में हगेगी तो (गोबर) ऊपर आएगा ही।
अर्थ- छिपी हुई बात प्रकट हो जाती है। सच्चाई छिप नहीं सकती, बनावट के वसूलों से।
33. सोने के कुदारी माटी कोड़े के हअ।
अनुवाद- सोने की कुदाल माटी कोड़ने के लिए है।
अर्थ- सबको अपनी योग्यतानुसार कार्य करना ही अच्छा होता है।
34.जे गुड़ खाई उ कान छेदाई।
अनुवाद- जो गुड़ खाएगा वो कान छेदाएगा।
अर्थ- गलत काम का परिणाम भी गलत होता है।
35.कमजोर देही में बहुत रीसि होला।
अनुवाद- कमजोर शरीर में बहुत गुस्सा होता है।
अर्थ- कमजोर व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता है।
36.बिन घरनी,घर भूत के डेरा।
अनुवाद- बिन औरत, घर भूत के डेरा।
अर्थ- औरत से ही घर,घर लगता है।
37.मानS तS देव नाहीं तS पत्थर।
अनुवाद- मानिए तो देव नहीं तो पत्थर।
अर्थ- विश्वास ही सर्वोपरी है।
38.की हंसा मोती चुने,की भूखे मर जाय।
अनुवाद- कि हंस मोती चुगे,कि भूखे मर जाए।
अर्थ- शेर जब भी खाएगा मांस ही खाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ व्यक्ति परेशानी उठा लेंगे लेकिन अपने वसूल यानि मान-मर्यादा के खिलाफ नहीं जाएँगे।
39.सब धान बाइसे पसेरी।
अनुवाद- सब धान बाइस ही पसेरी। (पसेरी एक तौल है जो लगभग पाँच किलो के बराबर माना जाता है)
अर्थ- सब एक जैसे। (व्यंग्य में कहा जाता है- एक जैसे गलत लोगों के लिए। जैसे- अगर आप के तीन-चार लड़के हैं और सब कुपात्र ही हैं तो आप अपने बच्चों के लिए कह सकते हैं- सब धान बाइसे पसेरी। )
40.दादा कहने सरसउवे लदीहS।
अनुवाद- दादा कहे सरसों ही लादना (यानि सरसों का ही व्यापार करना)
अर्थ- लकीर के फकीर।
41.सइंया भये कोतवाल,अब डर काहे का।
अनुवाद- सैंया भए कोतवाल तो अब किस बात का डर।
अर्थ- अपने शासन में अपनीवाली करना। यानि जिसकी लाठी उसकी भैंस।
42.बाप ओझा अउरी माई डाइन।
अनुवाद- बाप ओझा (झाड़-फूँक करनेवाला) और माँ डाइन।
अर्थ- विरोधाभास। एक अच्छा तो दूसरा बुरा।
43.रोजो कुँआ खोदS अउरी रोजो पानी पीअS।
अनुवाद- रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना।
अर्थ- भविष्य के बारे में न सोचना। यानि केवल जो आगे आए उसी पर विचार करनेवाला। अदूरदर्शी व्यक्ति के लिए।
44.आगे नाथ ना पीछे पगहा,खा मोटा के भइने गदहा।
अनुवाद- आगे नकेल ना पीछे पगहा(पशु को बाँधने की रस्सी), खा मोटाकर हुए गदहा।
अर्थ- स्वछंद व्यक्ति। जिसको रोकने-टोकनेवाला कोई न हो और इसलिए वह मनमौजी काम करता हो।
45.आसमाने में थूकबS त मुँहवे पर आई।
अनुवाद- आसमान में थूकेंगे तो अपने मुँह पर ही आएगा।
अर्थ- उलटा-पुलटा काम करके खुद फँसना।
46.इस्क अउरी मुस्क छिपवले से नाहीं छीपेला।
अनुवाद- इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता।
अर्थ- प्रेम और कस्तूरी (एक प्रकार का गंधद्रव्य) प्रगट हो ही जाते हैं।
47.आदमी के काम हअए गलती कइल।
अनुवाद- आदमी का काम है गलती करना।
अर्थ- गलती (अनजाने में हुआ गलत काम) आदमी से ही होती है अस्तु क्षमा कर देना ही उचित होता है।
48.भगवान के माया कहीं धूप कहीं छाया।
अनुवाद- भगवान की माया कहीं धूप कहीं छाया।
अर्थ- दुनिया में जो कुछ भी घटित हो रहा है यानि अच्छा या बुरा,वह भगवान की ही कृपा से।
49.काठे के हाड़ी बार-बार नाहीं चढ़ेला।
अनुवाद- काठ की हाड़ी बार-बार नहीं चढ़ती।
अर्थ- किसी (समझदार) का दुरुपयोग एक ही बार किया जा सकता है, बार-बार नहीं।
50.काने के कच्चा।
अनुवाद- कान का कच्चा।
अर्थ- सहज विश्वासी। बिना सोचे-समझे विश्वास करनेवाला।
51.दूनू लोक से गइने पाड़े,न हलुआ मिलल न माड़े।
अनुवाद- दोनों लोक से गए पाण्डेय (ब्राह्मणों की एक उपजाति),न हलुआ मिला न माड़े (माड़-भात में से निकला लसदार थोड़ा गाढ़ा पदार्थ)।
अर्थ- धोबी का कुत्ता न घर का ना घाट का।
52.घर फूटे गँवार लूटे।
अर्थ- अगर घर में फूट पड़ जाए तो उल्लू भी अपना उल्लू सीधा कर लेता है। यानि घर में सदा एकता होनी चाहिए।
53.ना रही बाँस ना बाजी बँसुरी।
अनुवाद- न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
अर्थ- मूल का ही सफाया।
54.नानी के धन,बेइमानी के धन
अउरी जजमानी के धन नाहीं रसेला।
अनुवाद- ननिहाल,बेइमानी और यजमानी का
धन व्यर्थ ही जाता है। यानि किसी काम का नहीं होता।
55.नानी की आगे ननीअउरे के बखान।
अनुवाद- नानी की आगे ननिहाल का वर्णन।
अर्थ- जिसे सबकुछ मालूम हो,उसे बताना।
56.अंडा सिखावे बच्चा के,ए बच्चा तू
चेंव-चेंव करअ।
अनुवाद- अंडा सिखावे बच्चा को कि ऐ बच्चा तूँ चें-चें कर।
अर्थ- जिसे सबकुछ मालूम हो उसे बताना यानि अज्ञानी होकर ज्ञानी को उपदेश देना।
57.नौ के लकड़ी,नब्बे खर्च।
अनुवाद एवं अर्थ- नौ की लकड़ी,नब्बे खर्च।
58.पाव भरी के देबी अउरी नौ पाव पूजा।
अनुवाद- पावभर की देवी और नौ पाव पूजा।
अर्थ- नौ की लकड़ी,नब्बे खर्च।
59.माई के मनवा गाई जइसन
अउरी पूत के मनवा कसाई जइसन।
अनुवाद- माँ का मन गाय जैसा और पूत का मन कसाई जैसा।
अर्थ- पुत्र कुपुत्र पर माता सदा सुमाता।
60.नाहीं चिन त नाया कीन।
अनुवाद- नहीं पहचान तो नया खरीद।
अर्थ- पारखी न होने पर कोई भी वस्तु
नया ही खरीदना चाहिए।
61. बाभन,कुकुर,हाथी,नाहीं जात के साथी।
अनुवाद- ब्राह्मण,कुत्ता, हाथी, नहीं जाति के साथी।
अर्थ- ब्राह्मण,कुत्ता और हाथी अपनी ही जाति
के सदस्यों के शत्रु होते हैं यानि इनमें आपस में एकता का अभाव होता है।
विशेष- लेकिन हाथी एक झुंड में रहते हैं।
62. बनले के साथी सब केहू ह अउरी बिगड़ले के केहु नाहीं।
अनुवाद- बनने पर साथी सभी पर बगड़ने पर कोई नहीं।
अर्थ- सुख के साथी सभी हैं लेकिन दुख में ना कोय।
63. गइल राज जहवाँ चुगला पइठे, गइल पेड़ जहवाँ बकुला बइठे।
अनुवाद- गया राज्य जहाँ चुगला पैठे, गया पेड़ जहाँ बगुला बैठे।
अर्थ- चुगलखोर राज,परिवार आदि को नष्ट कर देते हैं और वह पेड़ भी
ठूँठ हो जाता है जिसपर बराबर बकुला बैठते हैं।
64. आइल थोर दिन, गइल ढेर दिन।
अनुवाद- आया थोड़ दिन, गया ढेर दिन।
अर्थ- समय बीतते देर नहीं लगती।
65. खिंचड़ी के चारी इआर, दही, पापर, घी, अचार।
अनुवाद- खिंचड़ी के चार यार,दही, पापड़, घी,अँचार।
अर्थ- खिंचड़ी खाने में तब मजा आता है जब साथ में दही,
पापड़, घी, और अँचार भी हो।
66. माघ के टूटल मरद अउरी भादो के टूटल बरध कबो नाहीं जुटेलें।
अनुवाद- माघ महीने में टूटा मर्द और भादों में टूटा बैल कभी नहीं जुटते।
अर्थ- माघ में जिस आदमी की शरीर टूट गई मतलब कमजोर हो गई और भाद्रपद में जिस बैल की शरीर कमजोर हो गई वह फिर कभी तैयार नहीं होती यानि उनका स्वास्थ्य फिर नहीं सुधरता।
67. बेटओ मीठ अउरी भतरो मीठ।
अनुवाद- बेटा भी मीठा और पति भी मीठा।
अर्थ- सबसे मिला हुआ।
68. तेली के लइका भूखे मरे अउरी लोग कहे की पी के मातल बा।
अनुवाद- तेली का लड़का भूखे मरे और लोग कहें कि पीकर मतवाला हो गया है।
अर्थ- किसी चीज का कारण कुछ और हो और कुछ और समझा जाए।
69. के पर करीं सिंगार पिया मोरे आनर।
अनुवाद- किस पर करूँ श्रृंगार, पिया मोरे अंधे।
अर्थ- उस काम को करने से क्या लाभ जिसका
महत्व समझने वाला ही कोई न हो।
70. निरबंस आछा लेकिन बहुबंस नाहीं आछा।
अनुवाद- निर्वंश अच्छा लेकिन बहुवंश नहीं अच्छा।
अर्थ- पुत्र हो तो सदाचारी न तो न ही हो।
71. गइने मरद जिन खइने खटाई अउरी
गइली मेहरारू जिन खइली मिठाई।
अनुवाद- गया मर्द जो खाया खटाई और गई औरत जो खाई मिठाई।
अर्थ- मर्द को खट्टी चीजें और औरतों को
मीठी चीजें कम खानी चाहिए।
72. गइल जवानी फिर ना लौटी, चाहें घी, मलीदा खा।
अनुवाद- गई जवानी फिर नहीं लौटेगी, चाहें घी, मलीदा खा।
अर्थ- एक बार जवानी जाने के बाद फिर कभी भी वापस नहीं आती। कुछ भी करें गया समय वापस नहीं आता।
73. बड़-बड़ घोड़ा दहाइल जा अउरी गदहा पूछे केतना पानी।
अनुवाद- बड़े-बड़े दह जाएँ और गदहा पूछे कितना पानी।
अर्थ- जो बड़ों से न हो वह छोटे करने का दुस्साहस करें (हास्य)। किसी छोटे द्वारा दुस्साहस करने पर कहा जाता है।
74. बतिया मानबी बाकिर खूँटवा ओहि जागि गारबी।
अनुवाद- बात मानूँगा पर खूँटा अपनी जगह पर ही गाड़ूँगा।
अर्थ- दूसरे की सुनना पर करना अपनी वाली ही।
75. हथिया की पेटे जाड़ ह।
अनुवाद- हाथी की पेट से जाड़ा है।
अर्थ- हस्त नक्षत्र से जाड़ा शुरु हो जाता है।
76.आधा माघे कंबर काँधे।
अनुवाद- आधा माघे कंबल कंधे।
अर्थ- आधा माघ महीना बीतते ही जाड़ा कम होने लगता है।
77. माघे जाड़ ना पूसे जाड़, जब बयारी बहे तबे जाड़।
अनुवाद- माघ में जाड़ा ना पूस में जाड़ा,जब हवा बहे तभी जाड़ा।
अर्थ- ठंडी के दिनों में जब हवा बहती है तो ठंडक बढ़ जाती है।
78. अबरे के मेहरारू गाँवभरी के भउजाई।
अनुवाद- दुर्बल की पत्नी गाँवभर की भौजाई।
अर्थ- कमजोर को सभी सताते हैं।
79.आखिर संख बाजल बाकिर बाबाजी के पदा के।
अनुवाद- आखिर शंख बजा लेकिन बाबाजी को पदा के।
अर्थ- काम होना लेकिन बहुत परीश्रम के बाद।
80. आपन अपने ह।
अनुवाद- अपना अपना है।
अर्थ- अपना अपना ही होता है।
81. एक हाथ के ककरी अउरी नौ हाथ के बिआ।
अनुवाद- एक हाथ की ककड़ी और नौ हाथ का बीज।
अर्थ- अफवाह। असत्य बात। किसी छोटी-सी बात को भी बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर बताना।
82. चाल रहे सादा जे निबहे बाप-दादा।
अनुवाद- चाल रहे सादा जो निबहे बाप-दादा।
अर्थ- चाल-चलन ऐसा रखना चाहिए कि जिसका निर्वाह आसानी से हो जाए।
83. पानी पीअs छानी के अउरी गुरु करs जानी के।
अनुवाद- पानी पीजिए छानकर और गुरु कीजिए जानकर।
अर्थ- पानी छानकर पीना चाहिए और सोच समझकर गुरु करना चाहिए।
84. नउआ के देखि के हजामत बड़ी जाला।
अनुवाद- हजाम को देखकर हजामत बढ़ जाती है।
अर्थ- असमय इच्छा करना। आवश्यकता न होने पर भी आसानी से प्राप्त होनेवाली वस्तु का उपयोग करने की इच्छा।
85. ए जबाना में पइसवे भगवान बाs।
अनुवाद एवं अर्थ- आधुनिक युग में पैसा ही भगवान है।
86. लोग न लइका मुँहे लागल करिखा।
अनुवाद- लोग न लड़का, मुँह में लगा कालिख।
अर्थ- बदनामी।
87. केहू खात-खात मुए अउरी केहू खइले बिना मुए।
अनुवाद- कोई खाता-खाता मरे और कोई खाने के बिना मरे।
अर्थ- दुरुपयोग होना। कहीं पर किसी वस्तु की अधिकता और कहीं पर कमी।
88. कबो घानी घाना कबो मुठी चना कबो उहो मना।
अनुवाद- कभी घानी घना, कभी मुट्ठी चना,कभी वह भी मना।
अर्थ- (क)किसी को कभी बहुत इज्जत देना और कभी अपमान करना। (ख)सब दिन होत न एक समाना।
89. जेतने वेकती ओतने कार, नाहीं वेकती नाहीं कार।
अनुवाद- जितने व्यक्ति उतना काम, नहीं व्यक्ति नहीं काम।
अर्थ- जितने लोग रहते हैं उतना ही काम रहता है।
90. जिनगी में उतार-चढ़ाव आवत जात रहेला।
अनुवाद- जिन्दगी में उतार-चढ़ाव आता-जाता रहता है।
अर्थ- सब दिन होत न एक समाना।
91. गाड़ी में दम नाहीं बारी में डेरा।
अनुवाद- गाड़ में दम नहीं बगीचे में डेरा।
अर्थ- डींगबाजी करनेवाले के लिए कहा जाता है। जो केवल बढ़-बढ़कर बातें करे उसके लिए कहा जाता है।
92. घर में दिया बारी के मंदिर में दिया बारल जाला।
अनुवाद- घर में दीपक जलाने के बाद मंदिर में दीपक जलाया जाता है।
अर्थ- पहले आत्मा फिर परमात्मा। पहले अपना काम फिर दूसरे का।
93. सुखे के साथी सब केहु हs।
अनुवाद- सुख के साथी सब हैं।
अर्थ- सुख के साथी सब हैं दुख का है न कोय।
94. घर के ना घाट के माई के न बाप के।
अर्थ- आवारा।
95. का कहीं कुछ कही ना जाता अउरी कहले बिना रही ना जाता।
अनुवाद- क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाता है और कहे बिना रहा नहीं जाता है।
अर्थ- बरदाश्त के बाहर। असह्य।
96. पातर देहरी अन्न के खानि।
अनुवाद- पतली देहली अन्न की खान।
अर्थ- पतला आदमी ज्यादे खाता है।
97. करिया अक्षर भँइस बराबर ।
अर्थ- काला अक्षर भैंस बराबर। (अनपढ़)
98. केहू के ऊँच लिलार देखि के आपन लिलार फोड़ी नाहीं लेहल जाला।
अनुवाद- किसी का ऊँचा मस्तक देखकर अपना मस्तक फोड़ नहीं लेना चाहिए।
अर्थ- किसी की बराबरी करने के लिए उलटा-पुलटा काम नहीं करना चाहिए।
99. गइल भँइस पानी में।
अनुवाद- गई भैंस पानी में।
अर्थ- हानि। घाटा।
100. महँगा रोए एकबार, सस्ता रोए बार-बार।
अर्थ- महँगी वस्तुएँ अधिक दिन चलती हैं और अच्छी भी होती हैं।
101. पूरी के पेट सोहारी से नाहीं भरी।
अनुवाद- पूड़ी का पेट सोहारी से नहीं भरेगा।
अर्थ- रुचि अनुसार भोजन होना चाहिए।
102. सब चाही त काम आँटी।
अनुवाद- सब चाहेंगे तो काम अँटेगा।
अर्थ- अगर सब लोग काम में हाथ बटाएँ तो काम मिनटों में समाप्त हो जाए।
103. सेतिहा के साग गलपुरना के भाजी।
अनुवाद- मुफ्त का साग गलपुरना की भाजी।
अर्थ- किसी वस्तु के होते हुए भी उसे और लाना जैसे लगे की मुफ्त की हो।
104. नेबुआ तs लेगइल सागे में मती डाले।
अनुवाद- नेंबू तो ले गया, साग में मत डाले।
अर्थ- किसी वस्तु के गलत प्रयोग होने की आशंका।
105. छिया-छिया गप-गप।
अनुवाद- छी-छी गप-गप।
अर्थ- किसी वस्तु को खराब भी कहना और उसका उपयोग भी करना।
106. बाबा के धियवा लुगरी अउरी भइया के धियवा चुनरी।
अनुवाद- दादा की बेटी लुगरी और भाई की बेटी चुनरी।
अर्थ- बुआ से अधिक मान बहन का होने पर कहा जाता है। यानि जो रिस्ते में जितना करीब उसका उतना ही मान।
107. सबकुछ खइनी दुगो भुजा ना चबइनी।
अनुवाद- सब कुछ खाया दो भुजा न चबाया।
अर्थ- भरपेट खाने के बाद भी इधर-उधर देखना कि कुछ खाने को मिल जाए।
108. हाथी आइली हाथी आइली पदलसी भढ़ाक दे।
अनुवाद- हाथी आयी, हाथी आयी पादी भढ़ाक दे।
अर्थ- अफवाह फैलने पर कहा जाता है यानि झूठी बात।
109. जवन रोगिया के भावे उ बैदा फुरमावे।
अनुवाद- जो रोगी को अच्छा लगे वही वैद्य बतावे।
अर्थ- किसी को वही काम करने को कहना जो उसको अच्छा लगे।
११०. आन की धन पर कनवा राजा।
अर्थ- दूसरे की वस्तु पर अपना अधिकार समझना।
111. बड़ के लइका पादे त बाबू के हवा खुली गइल अउरी छोट के
पादे त मार सारे पदले बा ।
अनुवाद- बड़ का लड़का पादे तो बाबू का हवा खुल गया और छोट का पादे तो मार साला पाद दिया।
अर्थ- बड़ को इज्जत और छोट का अपमान।
112. बुढ़वा भतार पर पाँची गो टिकुली।
अनुवाद- बुढ़े पति पर पाँच टिकली।
अर्थ- वह काम करना जिसकी आवश्यकता न हो।
113.बेटा अउरी लोटा बाहरे चमकेला।
अनुवाद- पुत्र और लोटा बाहर ही चमकता है।
अर्थ- जैसे लोटे का बाहरी भाग चमकता है वैसे ही पुत्र घर के बाहर नाम रोशन करता है यानि इज्जत पाता है।
114. खेतिहर गइने घर दाएँ बाएँ हर।
अनुवाद- खेतिहर गए घर दाएँ बाएँ हल।
अर्थ- मालिक के हटते ही काम करनेवाला कामचोरी करे।
115. खेत खा गदहा अउरी मारी खा जोलहा।
अनुवाद- खेत खाए गदहा और मार खाए जोलहा।
अर्थ- गलती करनेवाले को सजा न देकर किसी और को देना।
116. खा मन भाता अउरी पहिनS जग भाता।
अनुवाद- खाइए मन भाता और पहनिए जग भाता।
अर्थ- अपने रुचिनुसार भोजन करना चाहिए पर कपड़े ऐसा पहनना चाहिए
जो दूसरों को अच्छा लगे।
117. काम न धाम हे दे बानी हे दे।
अनुवाद- काम न धाम यहाँ हूँ यहाँ।
अर्थ- काम-धाम न करना लेकिन श्रेय लेने की कोशिश करना।
118.मँगनी के चनन, घिसें रघुनंनन।
अनुवाद- मँगनी के चंदन,घिसें रघुनंदन।
अर्थ- दूसरे की वस्तु का दुरुपयोग।
119. गाई गुन बछरू, पिता गुन घोड़ा,
नाहीं ढेर त थोड़ो थोड़ा।
अनुवाद- गाय गुण बछरू, पिता गुण घोड़ा,नहीं अधिक तो थोड़ो-थोड़ा।
अर्थ- गाय का गुण बछड़े में और पिता का गुण घोड़े में
थोड़ा बहुत अवश्य होता है।
120. एगो हरे गाँवभरी खोंखी।
अनुवाद- एक हर्रे,गाँवभर खाँसी।
अर्थ- एक अनार सौ बीमार।
121. बबुआ बड़ा ना भइया, सबसे बड़ा रुपइया।
अर्थ- पैसे का ही महत्व होना।
122. लबर-लबर लंगरो देवाल फानें।
अनुवाद- जल्दी-जल्दी लंगड़ी महिला दीवाल फाँदे ।
भावार्थ :- पारंगत न होते हुए भी आगे बढ़कर कोई काम शुरु कर देना।
123. बूनभर तेल करिआँवभरी पानी।
अनुवाद :- बूँदभर तेल और कमर तक पानी।
भावार्थ :- कम में काम चल जाए फिर भी ज्यादे का उपयोग।
124. गइयो हाँ अउरी भइँसियो हाँ।
अनुवाद :- गाय भी हाँ और भैंस भी हाँ ।
भावार्थ :- गलत या सही का भेद न करते हुए किसी के हाँ में हाँ मिलाना।
125. भगीमाने के हर भूत हाँकेला।
अनुवाद :- भाग्यवान का हल भूत हाँकता (चलाता) है।
भावार्थ :- भाग्यवान का भाग्य आगे-आगे चलता है।
126. दुलारी घिया के कनकटनी नाव।
अनुवाद :- दुलारी बेटी का कनकटनी नाम।
भावार्थ :- ज्यादे दुलार बच्चों को बिगाड़ सकता है।
127. साँचे कहले साथ छुटेला।
अनुवाद :- सच्चाई कहने से साथ छूटता है।
भावार्थ :- सच्चाई कहने से दुश्मनी हो जाती है।
128. साँच के आँच नाहीं लागेला।
अनुवाद :- साँच को आँच नहीं।
भावार्थ :- सच्चा का अहित नहीं होता ना ही डर।
129. हँसुआ की बिआहे में खुरपी के गीत।
अनुवाद :- हँसुआ की विवाह में खुरपी का गीत।
भावार्थ :- जहाँ जो करना चाहिए वह न करके कुछ और करना।
130. साँपे के काटल रसियो देखी के डेराला।
अनुवाद :- जिसको साँप काट देता है वह रस्सी को भी देखकर डरता है।
भावार्थ :- दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है।
131. जइसन देखीं गाँव के रीती ओइसन उठाईं आपन भीती।
अनुवाद :- जैसा देखें गाँव की रीत वैसा उठाएँ अपनी भीत।
भावार्थ :- समय को देखते हुए काम करें।
132. दूसरे की कमाई पर तेल बुकुआ।
भावार्थ :- दूसरे के पैसे से मौजमस्ती करना।
133. उपास से मेहरी के जूठ भला।
अनुवाद :- उपास से अपनी पत्नी का जूठ अच्छा।
भावार्थ :- बहुत कुछ न होने से कुछ होना भी ठीक है।
134. मारे छोहन छाती फाटे अउरी आँसू के ठेकाने नाहीं।
अनुवाद :- मारे प्रेम से छाती फाटे और आँसू का ठिकाना ही नहीं।
भावार्थ :- दिखावामात्र। घड़ियाली आँसू बहाना।
135. जवने खातिर अलगा भइनीऽ उहे परल बखरा।
अनुवाद :- जिसके लिए अलग हुआ वही मेरे हिस्से में आ गया।
भावार्थ :- अनचाहा काम आदि जो करना पड़े।
136. ना नीमन गीती गाइबी, ना दरबार धके जाइबी।
अनुवाद :- ना अच्छा गीत गाऊँगा ना दरबार पकड़कर जाऊँगा।
भावार्थ :- जानबूझकर हमेशा गलत काम ही करना।
137. जइसन बोअबऽ, ओइसन कटबऽ।
अनुवाद :- जैसा बोएँगे, वैसा काटेंगे।
भावार्थ :- कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति।
138. कोदो देके नइखीं पढ़ले।
अनुवाद :- कोदों देकर नहीं पढ़ा हूँ।
भावार्थ :- अपने आप को मूर्ख नहीं समझना।
139. सुखे सिहुला दुखे दिनाइ, करम फूटे तS फाटे बेवाइ।
भावार्थ :- सुख में सिहुला (एक त्वचा रोग) होता है, दुख में दिनाइ (एक प्रकार का खाज रोग)
और जब कर्म ही फूट जाता है तो पैर में बिवाई फट जाती है।
140. सउती के रीसि कठवती पर।
अनुवाद :- सौत का गुस्सा कठौत पर।
भावार्थ :- गुस्सा किसी और का और निकालना किसी और पर।
141. एक तऽ बानर दूसरे मरलसी बीछी।
अनुवाद :- एक तो वानर दूसरे मार दी बिच्छी।
भावार्थ :- एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा।
142. आँधर गुरु बहिर चेला, माँगे गुड़ ले आवे ढेला।
अनुवाद- अंधा गुरु बहरा चेला,माँगे गुड़ लाए ढेला।
भावार्थ :- उलटा काम करना।
143. कोरा में लइका अउरी गाँवभरी ढ़िढोरा।
अनुवाद :- गोदी में लड़का और गाँवभर में ढ़िढोरा।
भावार्थ :- वास्तविकता को छोड़ अफवाह पर ध्यान।
144. मन चंगा तऽ कठवती में गंगा।
भावार्थ :- मन साफ होना चाहिए।
145. चिउरा के गवाह दही।
अनुवाद-चिउड़ा का गवाह दही।
अर्थ- एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।
146. का अंधरा की जगले अउरी का ओकरी सुतले।
अनुवाद- क्या अंधे व्यक्ति के जगने से और उसके सोने से।
अर्थ- अनुपयोगी।
147. केहु कही दी की कउआ कान लेगइल, तs आपन कान टोवबs आकि कउआ की पीछे दउड़बs।
अनुवाद- कोई कह देगा कि कौआ कान ले गया तो अपना कान देखेंगे या कौआ के पीछे भागेंगे।
अर्थ- अफवाह पर ध्यान न देकर वास्तविकता जानें।
148. बेहाया की पीठी पर रूख जामल ओकरा खातिर छाहें हो गइल।
अनुवाद- बेहया की पीठ पर पेड़ जम गया तो उसके लिए छाया हो गया।
अर्थ- निर्लज्जता से बाज न आना।
149. दान की बछिया के दाँत नाहीं गिनल जाला।
अनुवाद- दान की बछिया के दाँत नहीं गिनते।
अर्थ- मुफ्त में मिल रही वस्तु के अवगुण नहीं देखते।
150. जे ऊँखियारे ऊँखी नाहीं दी ऊ कलुहारे मिठा देई।
अनुवाद- जो गन्ने के खेत में गन्ना नहीं देगा वह
कोल्हुआड़ (गुड़ पकाने की जगह) में गुड़ देगा।
अर्थ- बड़बोला।
151. मुराइलो हँसुआ अपनीए ओर खींचेला।
अनुवाद- भोथरा हँसुआ भी अपनी ओर ही खींचता है।
अर्थ- पक्षपात करना।
152.चिरई के जान जा, लइकन के खेलौना।
अनुवाद- चिड़िया का जान जाए और बच्चों का खिलौना।
अर्थ- दूसरे के कष्ट को नजरअंदाज करना।
153. ना चलनी में पानी आइ ना मूंजी के बरहा बराई।
अनुवाद- ना चलनी में पानी आएगा ना मूँज का बरहा बन पाएगा।
अर्थ- असम्भव काम।
154. सूप त सूप चलनियो हँसे जवने में छपन गो छेद।
अनुवाद- सूप तो सूप छलनी भी हँसे जिसमें छप्पन छेद होता है।
अर्थ- अवगुणी व्यक्ति द्वारा दूसरे की कमियाँ निकालना।
155. बीछी के मंतरिए ना जाने अउरी साँपे की बिअली में हाथ डाले।
अनुवाद- बिच्छी का मंतर ही न जाने और साँप के बिल में हाथ डाले।
अर्थ- नासमझ होते हुए भी समझदार बनने का दिखावा करना।
156. लाते के देवता बाती से ना मानेला।
अनुवाद- लात का देवता बात से नहीं मानता है।
अर्थ- दुष्ट को समझाने से कोई फायदा नहीं।
157. राम मिलवने जोड़ी एगो आँधर एगो कोढ़ी।
अनुवाद- राम मिलाए जोड़ी एक आँधर एक कोढ़ी।
अर्थ- जो जैसा रहता है उसकी संगति भी वैसी ही मिल जाती है।
(दानी को दानी मिले, मिले सोम को सोम
अच्छा को अच्छा मिले, मिले डोम को डोम।)
158. जेकर बनरिया उहे नचावे, दूसर जा त काटे धावे।
अनुवाद- जिसकी बन्दरिया वही नचावे, दूसरा जा तो काटे धावे।
अर्थ- जिसकी जो वस्तु होती है उसका उपयोग वही अच्छी तरह कर सकता है।
159. आई आम चाहें जाई लबेदा।
अनुवाद- आएगा आम या जाएगा लबेदा।
अर्थ- हानि-लाभ की परवाह न करते हुए काम करना।
160. अपनी दही के केहु खट नाहीं कहेला।
अनुवाद- अपनी दही को कोई खट्टा नहीं कहता है।
अर्थ- अपनी वस्तु आदि की कोई बुराई नहीं करता है।
161. सब धन-धाम सरीरिएले।
अनुवाद- सब धन-धाम शरीर तक ही।
अर्थ- जबतक शरीर ठीक है तभी तक धन कमाया जा सकता है या घूमा (तीर्थयात्रा) जा सकता है।
162. रोवे गावे तूरे तान, ओकर दुनिया राखे मान।
अर्थ- नंगा (निर्लज्ज होकर हंगामा करनेवाला) की बात सब लोग मान लेते हैं।
163.रोवहीं के रहनी तवले अँखिए खोदा गइल।
अनुवाद- रोने को था ही तभी आँख खुद गई।
अर्थ- इच्छित काम होना। जैसा चाहना वैसा (घटना, काम आदि) हो जाना (नकारात्मक)।
जवन रोगिया के भावे उ बैदा फरमावे।
164. बढ़ जाती बतिअवले अउरी छोट जाती लतिअवले।
अर्थ- सभ्य बात से समझता है जबकि असभ्य (नीच) मारपीट से।
165. ए कुकुर तू काहें दूबर, दू घर के आवाजाई।
अनुवाद- ऐ कुक्कुर तुम क्यों दुर्बल, दो घर का आना-जाना।
अर्थ- धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।
166. करिया बाभन गोर चमार।
अनुवाद- काला ब्राह्मण गोर चमार।
अर्थ- दोनों बहुत तेज (ढीठ) होते हैं।
167. गोर चमाइन गर्भे आनर।
अनुवाद- गोर चमाइन घमंड से अंधी।
अर्थ- गोर चमाइन को घमंड होता है।
168. घीव देख बाभन नरियात।
अनुवाद- घी देखते ही ब्राह्मण चिल्लाए।
अर्थ- मनचाही वस्तु मिलने पर भी नाटक करना।
169. तीन जाति अलगरजी, नाऊ, धोबी, दर्जी।
अर्थ- हजाम, धोबी और दर्जी बेपरवाह होते हैं।
170. तीन जाति गड़िआनर, ऊँट, बिदारथी, बानर।
अर्थ- ऊँट, विद्यार्थी और वानर अविवेकी होते हैं।
171. अहिर मिताई कब करे जब सब मीत मरी जाए।
अनुवाद- अहिर से दोस्ती जब करे जब सब दोस्त मर जाएँ।
अर्थ- अहिर से दोस्ती अच्छी नहीं होती।
172. छत्री के छौ बुधी, बभने के बारह, अहिरे के एके बुधी
बोलब त मारबी।
अनुवाद- क्षत्रिय की छह बुद्धि, ब्राह्मण की बारह, अहिर
की एक ही बुद्धि बोलोगे तो मारूँगा।
173. बाभन मुअतो खाला अउरी जिअतो खाला।
अनुवाद- ब्राह्मण मरकर भी खाता है और जीते भी खाता है।
अर्थ- ब्राह्मण से कभी पीछा नहीं छूटता।
174. जे पंडीजी बिआह करावेने उहे पिंडो परावेने।
अनुवाद- जो पंडित विवाह कराता है वही पिंडदान भी।
अर्थ- अच्छा बुरा दोनों करना।
175. बभने में तिउआरी, कटहल के तरकारी अउरी हैजा के बेमारी।
अनुवाद- ब्राह्मण में तिवारी और कटहल की तरकारी एवं हैजा की बीमारी।
अर्थ- तीनों का भरोसा नहीं।
176. (बभने के)एक बोलावे तेरह धावे।
अनुवाद- ब्राह्मण को एक बार बुलाइए, तेरह बार आएगा।
अर्थ- ब्राह्मण खाने के लिए लालची होते हैं।
177. बिना बुलावे कुकुर धावे।
अनुवाद- बिना बुलाए कुत्ता जाए।
अर्थ- बिना बुलाए कहीं नहीं जाना चाहिए।
178. धन के बढ़ल अछा हS, मन के बढ़ल नाहीं।
अनुवाद एवं अर्थ- धन का बढ़ना अच्छा है, मन का बढ़ना नहीं।
179. अकेले मियाँ रोवें की कबर खानें।
अनुवाद- अकेले मियाँ रोएँ कि कब्र खोदें।
अर्थ- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।
180. आन की धन पर तीन टिकुली।
अनुवाद- दूसरे की धन पर तीन टिकुली।
अर्थ- दूसरे की धन पर ऐश करना।
181. आन की धन पर तेल बुकुआ।
अनुवाद- दूसरे की धन पर तेल बुकुवा।
अर्थ- दूसरे की धन पर मजे करना।
बुकुवा= पानी के साथ पीसी हुई सरसों (जिसे तेल के साथ शरीर पर मलते हैं)
विशेषकर बच्चों, नई नवेली दुल्हन और जच्चा को।
182. इ कढ़ावें त उ घोंटावें।
अनुवाद- ये कुछ कहें तो वे हामी भरें।
अर्थ- गहरी यारी।
183. उखड़े बार नाहीं अउरी बरियार खाँव नाव।
अनुवाद- उखड़े बाल नहीं और बहादुर खाँ नाम।
अर्थ- मिट्टी के शेर। बनावटी वीर।
184. काम के न काज के, दुश्मन अनाज के।
अर्थ- अयोग्य पर खदक्कड़ (पेटू)।
185. कुत्ता काटे अनजान के अउरी बनिया काटे पहचान के।
अर्थ- कुत्ता अपरिचित को काटता है और बनिया पहचानवाले को ठगता है।
186. बिधी के लिखल बाँव ना जाई।
अनुवाद- विधि का लिखा गलत नहीम होगा।
अर्थ- विधि का लिखा अवश्य घटित होगा।
187. गइल माघ दिन ओनतीस बाकी।
अनुवाद- गया माघ दिन उनतीस बाकी।
अर्थ- समय (अच्छा हो या बुरा) व्यतीत होते देर नहीं लगती।
188. गाइ ओसर अउरी भँइस दोसर।
अनुवाद- गाय पहलौठी और भैंस दूसरे।
अर्थ- पहली बार ब्याई हुऊ गाय और दूसरी बार ब्याई हुई भैंस अच्छी मानी जाती हैं।
189. जेकरी छाती बार नाहीं, ओकर एतबार नाहीं।
अनुवाद- जिसके सीने पर बाल नहीं, उसका भरोसा नहीं।
अर्थ- जिस मर्द के सीने पर बाल न हो, उसका भरोसा नहीं करना चाहिए।
190. मुरुगा ना रही त बिहाने नाहीं होई।
अनुवाद- मुर्गा नहीं रहेगा तो सुबह नहीं होगी।
अर्थ- किसी के बिना कोई काम नहीं रुकता।
191. देखादेखी पाप अउरी (और) देखादेखी धरम।
अर्थ- देखादेखी लोग अच्छे और बुरे कर्म करते हैं।
192. जे केहु से ना हारे उ अपने से हारेला।
अनुवाद एवं अर्थ- जो किसी से नहीं हारता है उसे किसी अपने (सगे) से हारना पड़ता है।
193. नरको में ठेलाठेली।
अनुवाद- नरक में भी ठेलाठेली।
अर्थ- कहीं भी आराम नहीं।
194. चाल करेले सिधरिया अउरी रोहुआ की सीरे बितेला।
अनुवाद- चाल करती है सिधरी और रोहू के सिर बितता है।
अर्थ- गल्ती करे कोई और, पकड़ा जाए कोई और।
195. करजा के खाइल अउरी पुअरा के तापल बरोबरे हS।
अनुवाद- कर्जा का खाना और पुआल तापना बराबर होता है।
अर्थ- कर्जा लेना अच्छा नहीं होता।
196. ढुलमुल बेंट कुदारी अउरी हँसी के बोले नारी।
अनुवाद- हिलता बेंत कुदाल का और हँस के बोले नारी।
अर्थ- दोनों से बचिए, खतरा कर सकती हैं।
197. कनवा के देखि के अँखियो फूटे अउरी कनवा बिना रहलो न जाए।
अनुवाद- काना व्यक्ति को देखकर आँख भी फूटे और उसके बिना काम भी न चले।
अर्थ- ऐसे व्यक्ति से घृणा करना जिसके बिना काम न चले।
198. हरिकल मानेला परिकल नाहीं मानेला।
अनुवाद- हड़कल मान जाता है लेकिन परिकल नहीं मानता है।
हड़कल यानि पानी के अभाव में एकदम कड़ा हो
गया (खेत) जिसमें हल भी नहीं धँसता है ।
(परिकल यानि वह व्यक्ति जिसे किसी चीज का चस्का लग गया हो
और उसके लिए वह उस काम को बार-बार करता हो)
अर्थ- खेत अगर हड़क जाए तो उसे धीरे-धीरे खेती योग्य बनाया
जा सकता है लेकिन परिकल व्यक्ति कतई नहीं मानता।
199. जेकर बहिन अंदर ओकर भाई सिकनदर।
अनुवाद- जिसकी बहन अंदर उसका भाई सिकंदर।
अर्थ- भाई अपने विवाहित बहन के घर में बेखौफ आता जाता है।
200. नाचे कूदे बंदर अउरी (और) माल खाए मदारी।
अर्थ- किसी दूसरे के मेहनताने पर ऐश करना।
201. रहे निरोगी जे कम खाया, काम न बिगरे जो गम खाया।
अर्थ- कम खाना और गम खाना अच्छा होता है।
202. केरा (केला), केकड़ा, बिछू, बाँस इ चारो की जमले नाश।
अर्थ- इन चारों की संतान ही इनका नाश कर देती है।
203. सांवा खेती, अहिर मीत, कबो-कबो होखे हीत।
अनुवाद एवं अर्थ-- साँवा की खेती और अहिर की दोस्ती कभी-कभी ही लाभदायक होते हैं।
204. आगे के खेती आगे-आगे, पीछे के खेती भागे जागे।
अर्थ- उपयुक्त समय की खेती अच्छी होती है लेकिन पीछे की गई खेती भाग्य पर निर्भर होती है।
205. बकरी के माई कबले खर जिउतिया मनाई।
अनुवाद- बकरी की माँ कबतक खर जिउतिया मनाएगी।
अर्थ- जो होना है वह होगा ही।
206. दस (आदमी) के लाठी एक (आदमी) के बोझ।
अर्थ- एकता में शक्ति है।
207. जवने पतल में खाना ओही में छेद करना।
अनुवाद- जिस पत्तल में खाना उसी में छेद करना।
अर्थ- विश्वासघात करना।
208. रोग के जड़ खाँसी।
अर्थ- खाँसी रोगों की जड़ है।
209. मन चंगा त कठवती में गंगा।
अनुवाद- मन चंगा तो कठवत में गंगा।
अर्थ- मन की पवित्रता सर्वोपरि है।
210. सौ पापे बाघ मरेला।
अनुवाद- सौ पाप करने पर बाघ मरता है।
अर्थ- अति सर्वत्र वर्जयेत। पाप का घड़ा भरेगा तो फूटेगा ही ।
211. बाभन,कुकुर, भाँट, जाति-जाति के काट।
अर्थ- ब्राह्मण ,कुत्ता और भाँट अपनी जाति के लोगों के ही दुश्मन होते हैं।
212. गाइ बाँधी के राखल जाले साड़ नाहीं।
अनुवाद- गाय बाँधकर रखी जाती है, साड़ नहीं।
अर्थ- मर्द की अपेक्षा औरत पर ज्यादे निगरानी रखना।
213. जीअत पर छूँछ भात, मरले पर दूध-भात।
अनुवाद- जीवित रहने पर केवल भात, मरने पर दूध-भात।
अर्थ- मरने के बाद आदर बढ़ जाना।
214. एगो पूते के पूत अउरी एगो आँखी के आँखि नाहीं कहल जाला।
अनुवाद- एक पूत को पूत और एक आँख को आँख नहीं कहा जाता।
अर्थ- संतान एक से अधिक ही अच्छी है।
215. लोहा के लोहे काटेला।
अनुवाद- लोहे को लोहा काटता है।
अर्थ- समान प्रकृतिवाला ही भारी पड़ता है।
216. मरले से भूतो भागी जाला।
अनुवाद- मारने से भूत भी भग जाता है।
अर्थ- कभी-कभी बिना कठोर हुए काम नहीं चलता। कभी-कभी अंगुली टेड़ी ही करनी पड़ती है।
217. खाली बाती से काम नाहीं चलेला।
अनुवाद- केवल बात से काम नहीं चलता।
अर्थ- काम करके दिखाना चाहिए केवल गप नहीं मारना चाहिए।
218. बुरा काम के नतीजो बुरे होला।
अनुवाद एवं अर्थ- बुरे काम का नतीजा भी बुरा ही होता है।
219. जाहाँ लूटी परे ताहाँ टूटी परे, जाहाँ मारी परे ताहाँ भागी परे।
अनुवाद- जहाँ लूट पड़े तहाँ टूट पड़े, जहाँ मार पड़े तहाँ भाग पड़े।
अर्थ- खुदगर्ज।
220. उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी, भीख निदान।
अर्थ- (दादा-परदादा के समय में) सबसे अच्छा खेती करना उसके बाद व्यापार करना और उसके बाद नौकरी और सबसे गया गुजरा काम भीख माँगना माना जाता था।
221. खाँ भीम अउरी हगें सकुनी।
अनुवाद- खाएँ भीम और दिशा मैदान करें शकुनी।
अर्थ- एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।
222. थूके सतुआ नाहीं सनाई।
अनुवाद- थूक से सतुआ नहीं सनेगा (गूँथेगा)।
अर्थ- अत्यधिक परिश्रम/सामग्री आदि की आवश्यकता होना। मेहनत की आवश्यकता।
223. जाति सुभाव ना छुटे, टाँग उठा के मुते। (कुत्ता)
अनुवाद- जाति स्वभाव ना छुटे, टाँग उठाकर मूते।
अर्थ- स्वभाव (प्रकृति) नहीं बदलता।
जैसे- चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।
224. चलनी में दूध दुहे अउरी करमे के दोस दे।
अनुवाद- चलनी (छलनी) में दूध दुहना और कर्म को दोष देना।
अर्थ- गलती खुद करना और दोष दूसरे पर लगाना।
225. का हरदी के रंग अउरी का परदेशी के संग।
अनुवाद- क्या हरदी का रंग और क्या परदेशी का संग।
अर्थ- क्षणभंगुर वस्तुओं का क्या भरोसा।
226. आन के दाना हींक लगाके खाना।
अनुवाद- आन का दाना भरपेट (दबाकर) खाना।
अर्थ- सुलभ (या दूसरे की) वस्तु का दुरुपयोग।
227. जिअते माछी नाहीं घोंटाई।
अनुवाद- जिंदा मक्खी नहीं घोंटी जाती (खाई जाती)।
अर्थ- अपने सामने ही कोई ग़लती करे तो उसको नजरअंदाज करना मुश्किल होता है।
228. एतना बड़ाई अउरी फटही रजाई।
अनुवाद- इतनी बड़ाई और फटी हुई रजाई।
अर्थ- उस योग्य न होने पर भी अपने को उससे बढ़ चढ़कर बताना।
(ऊँची दुकान, फीका पकवान)
229. हुँसीयार लइका हगते चिन्हाला।
अनुवाद- होशियार लड़का पाखाना करते समय भी पहचाना जाता है ।
अर्थ- होनहार विरवान के होत चिकने पात।
230. धोबिया अपनी गदहवो के बाबू कहे।
अनुवाद- धोबी अपने गदहे को भी बाबू कहे।
अर्थ- मीठा बोलें और सम्मानित बोलें।
अपनी बोली (भाषा) कभी खराब न करें, सुबोली बोलें न कि कुबोली।
231. कुल अउरी कपड़ा रखले से।
अनुवाद- कुल (वंश) और कपड़ा हिफाजत करने से।
अर्थ- कुल और कपड़े की अगर देखभाल नहीं होगी तो वे नष्ट हो जाएँगे।
232. आन्हर कुकुर बतासे भोंके।
अनुवाद- अंधा कुत्ता हवा बहने पर भी भोंके।
अर्थ- ऐसे ही या थोड़ा-सा भी संदेह होने पर हंगामा करना।
(जानना ना समझना और ऐसे ही बकबक शुरु कर देना)
233. दाँत बा तS चाना नाहीं, चाना बा तS दाँत नाहीं।
अनुवाद- दाँत है तो चना नहीं, चना है तो दाँत नहीं।
अर्थ- समयानुसार आवश्यक वस्तु की कमी।
234. ओरवानी के पानी बड़ेरी नाहीं चढ़ेला।
अनुवाद- ओरवानी (मढ़ई का निचला हिस्सा जहाँ से पानी गिरता है) का पानी
बड़ेरी (मथानी यानि मड़ई का सबसे ऊपरी भाग) नहीं चढ़ता।
अर्थ- असम्भव या विपरीत काम।
235. घर में भूजी भाँग नाहीं बीबी पादे चिउड़ा।
अनुवाद- घर में भूजिया (चावल), भाँग नहीं और बीबी पादे चिउड़ा।
अर्थ- उस योग्य न होने पर भी अपने को उससे बढ़ चढ़कर बताना।
-अत्यधिक बहसना।
236. हर द हरवाह द अउरी गाड़ी खोदे के पैना द।
अनुवाद- हल दीजिए, हलवाहा दीजिए और बैल
को हाँकने के लिए डंडा भी दीजिए।
अर्थ- पूरी तरह से दूसरे पर निर्भर होने वाले आलसी जो सब कुछ
दूसरे से ही अपेक्षा करते हैं उनके लिए कहा जाता है।
237. लाठी के मारल भुला जाला लेकिन बाती के नाहीं।
अनुवाद- लाठी की मार भुल जाती है लेकिन बात की नहीं।
अर्थ- बात रूपी तीर से घायल व्यक्ति का घाव कभी नहीं भरता।
238. ओस चटले से पिआस नाहीं बूझी।
अनुवाद- ओस चाटने से प्यास नहीं बूझती।
अर्थ- आवश्यकता से बहुत ही कम की प्राप्ति से क्या लाभ।
239. देही ना दासा गाड़ी तेलवासा।
अनुवाद- देह न दासा गाड़ तेलवासा (तेल लगाना)।
अर्थ- अच्छी शरीर न होने पर भी अत्यधिक बनाव-श्रृंगार
करनेवालों के लिए कहा जाता है।
240. गारी में लसालस नाहीं पादे ठसाठस।
अनुवाद- गाड़ में लसालस नहीं पादे ठसाठस।
अर्थ- अत्यधिक बहसनेवाले को कहा जाता है।
241. खाना कुखाना उपासे भला, संगत कुसंगत अकेले भला।
अर्थ- भोजन सदा समय पर करें और कुसंगत से बचें।
242. जात-जात के भेदिया जात-जात घर जाए
बाभन, कुक्कुर, घोड़िया, जात देखि नरियाए।
अर्थ- ब्राह्मण, कुत्ता और घोड़ा अपनी ही जाति के दुश्मन होते हैं।
243. मरदे के खाइल अउरी मेहरारू के नहाइल, केहू देखेला नाहीं।
अनुवाद- मर्द का खाना और औरत का नहाना, कोई नहीं देख पाता।
अर्थ- मर्द को खाने में और औरत को नहाने में अधिक समय नहीं लगाना चाहिए।
244. लामही से पाँव लागी लेहल ठीक ह।
अनुवाद- दूर से ही प्रणाम कर लेना अच्छा है।
अर्थ- कभी-कभी अत्यधिक मेल-जोल ठीक नहीं।
245. चमरा की मनवले डांगर नाहीं मरेला।
अनुवाद- चमार के मनाने से पशु नहीं मरता।
अर्थ- वही होगा जो भगवान चाहेगा।
246. इडिल-मिडिल के छोड़ आस, धर खुरपा गढ़ घास।
अनुवाद- इडिल-मिडिल का छोड़िए आस, खुरपा पकड़कर गढ़िए घास।
अर्थ- पढ़ने में मन न लगे तो कोई और काम करना ही अच्छा है।
247. खिचड़ी खात के नीक लागे अउरी बटुली माजत के पेट फाटे।
अनुवाद- खिचड़ी खाते समय अच्छी लगे और बरतन धोते समय परेशानी हो।
अर्थ- बिना मेहनत के आराम करना ठीक नहीं।
248. फटकी के लS अउरी अउरी फटकी के दS।
अनुवाद- फटक कर लीजिए और फटक कर दीजिए।
अर्थ- हिसाब बराबर रखना। मरौवत न रखना।
249. अहिर से इयारी, भादो में उजारी।
अनुवाद- अहिर से यारी, भादों में उजारी (उजाड़)।
अर्थ- अहिर की दोस्ती ठीक नहीं।
250. बभने के बनावल नाहीं त बभने खाई, नाहीं त बैले खाई।
अनुवाद- ब्राह्मण का बनाया नहीं तो ब्राह्मण खाएगा नहीं तो बैल खाएगा।
अर्थ- ब्राह्मण भोजन या तो बहुत ही अच्छा बनाता है नहीं तो बहुत ही खराब।
251. जनम के संघाती सब केहु ह लेकिन करम के नाहीं।
अनुवाद- जनम के दोस्त सभी होते हैं लेकिन कर्म का कोई नहीं।
अर्थ- कर्म खुद करना पड़ता है।
252. बहसू के नव गो हर, खेते में गइल एको नाहीं।
अनुवाद- बहसनेवाला के पास नौ हल, पर खेत में गया एक भी नहीं।
अर्थ- केवल बहसने से काम नहीं चलता।
253. करब केतनो लाखी उपाई, बिधी के लिखल बाँव न जाई।
अनुवाद- करेंगे कितना भी लाख उपाय, विधि का लिखा घटित होगा ही।
अर्थ- जो भाग्य में है वह होकर रहेगा।
254. चालीस में चारी कम (३६), हजाम, पंडीजी सलाम।
अनुवाद- चालीस में चार कम हजाम, पंडितजी सलाम।
अर्थ- हजाम छत्तीसा (बहुत चालाक) होते हैं और उनका टक्कर केवल पंडित ही ले सकता है।
255. उँखी बहुत मीठाला त ओमे कीड़ा पड़ी जाने कुली।
अनुवाद- गन्ना बहुत मीठा होता है तो उसमें कीड़े पड़ जाते हैं।
अर्थ- संबंध की एक सीमा होनी चाहिए।
256. लाठी के देवता बाती से नाहीं मानेलें।
अनुवाद- लाठी के देवता बात से नहीं मानते।
अर्थ- दुष्ट समझाने से नहीं समझता। कभी-कभी अंगुली टेड़ी करना आवश्यक होता है।
257. खोंसू के जान जा अउरी खवइया के सवादे ना मिले।
अनुवाद- खोंसू (बकरा) का जान जाए और खानेवाले को स्वाद ही न मिले।
अर्थ- बहुत ही हुज्जत करना ताकि कोई परेशान रहे।
258. चोरवा के मन बसे ककड़ी की खेत में।
अनुवाद- चोर का मन बसे ककड़ी के खेत में।
अर्थ- आदत नहीं जाती।
259.बाँसे की कोखी रेड़ जामल।
अनुवाद- बाँस की कोंख से रेड़ पैदा होना।
अर्थ- कुपुत्र होना।
260. बाभन बुधी।
अनुवाद- ब्राह्मण बुद्धि।
अर्थ- चालूपना ।प्रयोग-- यहाँ ब्राह्मण बुद्धि नहीं चलेगी।
261. नीक रही करम, त का करीहें बरम।
अनुवाद- अच्छा रहेगा करम, तो क्या करेंगे बरम (एक गाँव के देवता)।
अर्थ- अपना कर्म हमेशा अच्छा रखना चाहिए।
262. पैर पुजाइल बा पीठी नाहीं।
अनुवाद- पैर की पुजा हुई है पीठ की नहीं।
अर्थ- एक सीमा तक ही सहा जा सकता है।
(यह कहावत उदंड रिस्तेदार जैसे उदंड दमाद आदि के लिए कही जाती है)
263. जेतने मुँह ओतने बातें।
अनुवाद- जितने मुँह उतनी बातें।
अर्थ- सब अपनी-अपनी राय देते हैं या अपनी-अपनी बुद्धि से एक ही बात को अलग-अलग ढंग से कहते हैं।
264. कुकुरे के पोंछी बारह बरिस गाड़ी के राख, टेड़े के टेड़े रही।
अनुवाद- कुत्ते की पूँछ को बारह वर्ष गाड़कर रखिए, टेड़ी की टेड़ी रहेगी।
अर्थ- स्वभाव (प्रकृति) बदलना बहुत ही कठिन होता है।
265. भगवान के बाँही बहुत लमहर ह।
अनुवाद- भगवान की बाँह बहुत लंबी होती है।
अर्थ- भगवान सबकी रक्षा करता है।
266. भूखे भजन न होई गोपाला, ले लS आपन कंठी माला।
अनुवाद- भूखे भजन न होय गोपाला, ले लीजिए अपनी कंठी माला।
अर्थ- भूखे रहकर कोई काम नहीं होता।
267. जब भगवान मुँह चिरले बाने त खाएके देबे करीहें।
अनुवाद- जब भगवान मुँह बनाए हैं तो खाना भी देंगे।
अर्थ- अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।
268. माई के जिअरा (मनवा) गाई अइसन, बाप के जिअरा कसाई अइसन।
अनुवाद- माँ का हृदय गाय के समान, बाप का हृदय कसाई के समान।
अर्थ- बाप की अपेक्षा माँ अत्यधिक स्नेही होती है।
269. बड़ रहें जेठानी त राखें आपन पानी।
अनुवाद- बड़ रहें जेठानी तो रखें अपना पानी (इज्जत)।
अर्थ- अपनी इज्जत अपने हाथ में है।
270. लाजे भवही बोले ना अउरी सवादे भसुर छोड़े ना।
अनुवाद- लज्जा के कारण भवज बोले नहीं और स्वाद के लिए भसूर (जेठ- पति का जेठा भाई) छोड़े नहीं।
अर्थ- किसी की चुप्पी या मजबूरी का नाजायज फायदा उठाना।
271. वेश्या में नाव लिखाइल त का मोट अउरी का पातर।
अनुवाद- वेश्या में नाम लिख गया तो क्या मोटा और क्या पतला।
अर्थ- जो काम करना है उसे करना है चाहे वह छोटा हो या बड़ा।
272. आपन पुतवा पुतवा ह अउरी सवतिया के पुतवा दूतवा ह।
अनुवाद- अपना पुत पुत और सौत का पुत दूत।
अर्थ- अपने लोगों को ज्यादे महत्त्व देना और दूसरे को हीन समझना।
273. रसरी जरी गइल पर एंठ नाहीं गइल।
अनुवाद- रस्सी जल गई पर ऐंठ नहीं गई। (घमंड न जाना)
274. मन मोरा चंचल, जिअरा उदास, मन मोरा बसे इयरवा के पास।
अनुवाद- मन मेरा चंचल, मन उदास, मन मेरा बसे यार के पास।
अर्थ- मन की चंचलता या किसी काम में मन न लगना।
275.अपने खाईं, बिलरिया लगाईं।
अनुवाद- खुद खाना और बिल्ली को लगाना।
अर्थ- गलत काम खुद करके दूसरे के मत्थे मढ़ना।
276. मन में आन, बगल में छुरी, जब चाहे तब काटे मूरी।
अनुवाद- मन में कुछ और, बगल में छुरी, जब चाहो तब काटो मुंडी (सिर)।
अर्थ- बगुला भगत।
277. सरी पाकी जइहें, गोतिया ना खइहें, गोतिया के खाइल, अकारथ जइहें।
अनुवाद- सड़-पक जाएगा, दूसरा न खाएगा, दूसरे का खाया, अकारथ (बेकार) जाएगा।
अर्थ- खराब हो जाने देना लेकिन दूसरे को उपयोग न करने देना।
278. आपे-आपे लोग बिआपे, केकर माई केकर बापे।
अनुवाद- अपना-अपना लोग चिल्लाएँ, किसकी माँ किसका बाप।
अर्थ- सबको अपनी ही पड़ी है या सब अपना ही लाभ देख रहे हैं यहाँ तक कि माँ-बाप की चिंता करनेवाला कोई नहीं है।
279. आपन पेट त सुअरियो पाली लेले।
अनुवाद- अपना पेट तो सुअर भी पाल लेती है।
अर्थ- अपना पेट तो कोई भी पाल लेता है इसमें कौन-सी बड़ाई है। मानव वही जो सबका पेट भरे।
280. घीउ के लड्डू टेड़ों भला।
अनुवाद- घी का लड्डू टेड़ों भला।
281. एक घंटा माँगे त सवेसेर अउरी (और) दिनभर माँगे त सवे सेर।
अर्थ- मेहनत के बाद भी उन्नति न होना। जस का तस रहना।
282. बेटा के भुजा अउरी दमादे के जाउर।
अनुवाद- बेटा को कुरमुरा और दमाद को खीर।
अर्थ- अपनों का अनादर और दूसरों का सम्मान।
283. बुन्नी नाचे थुन्नी पर, फुहरी बड़ेरी पर।
अनुवाद- बुन्नी नाचे थूनी पर, फूहड़ी (फूहड़ महिला) बड़ेर (मड़ई का सबसे ऊपरी भाग) पर।
अर्थ- डिंग हाँकना (एक से बड़कर एक)।
284. पाईं त रस लाई, नाहीं त घर-घर आगी लगाईं।
अनुवाद- पाऊँ तो रस लाऊँ, नहीं तो घर-घर आग लगाऊँ।
अर्थ- मिलने पर खुश और न मिलने पर हंगामा।
285. खेलबी ना खेले देइबी, खेलिए बिगाड़बी।
अनुवाद- न खेलूँगा न खेलने दूँगा, खेल को बिगाड़ुँगा।
अर्थ- न खुद अच्छा काम करना न दूसरे को करने देना।
286. अपनी दुआरे, कुतवो बरिआरे।
अनुवाद- अपने दरवाजे पर कुत्ता भी बलवान।
अर्थ- अपनी गली में एक कुत्ता भी शेर होता है।
287. अभागा गइने ससुरारी अउरी उहवों माँड़े-भात।
अनुवाद- अभागा गए ससुरार और वहाँ भी माँड़े-भात।
अर्थ- समय खराब होता है तो चारों तरफ से।
288. हरीसचंद पर विपती पड़ी त पकवल मछरी जल में कूदी।
अनुवाद- हरिशचंद्र पर विपत्ति पड़ी तो (आग में) पकाई हुई मछली जल में कूदी।
अर्थ- विपत्ति बहुत बुरी होती है।
289. आपन निकाल मोर नावे दे।
अनुवाद- अपना निकालो और मेरा डालने दो।
अर्थ- केवल अपना स्वार्थ देखना।
290. इजती इजते पर मरेला।
अनुवाद- इज्जतदार इज्जत पर मरता है।
अर्थ- इज्जतदार अपनी इज्जत के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देता है।
291. उधिआइल सतुआ, पितर के दान।
अनुवाद- उड़ा हुआ सत्तू पितृ को दान।
अर्थ- अनुपयोगी (खराब) वस्तु दूसरे को देना।
292. बइठले ले बेगारी भला।
अनुवाद- बेकार से बेगार भला।
अर्थ- खाली बैठना ठीक नहीं। हमेशा कुछ न कुछ (अच्छा ही) करते रहना ही ठीक होता है।
293. बिन मारे मुदई(शत्रु) मरे, की खड़े ऊँख बिकाए(गन्ने की खड़ी फसल बिक जाए),
बिना दहेज के बर मिले तो तीनों काम बन जाए।
294. उत्तर लउका लउके, दखिन गरजे मेह,
ऊँचे दवड़ी नधइह, कही गइने सहदेव।
अर्थ- उत्तर दिशा में बिजली चमके और दक्षिण में बादल गरजे तो वर्षा अवश्य होती है।
295. सईयाँ के मन-मुँह पाईं तS सासु के झोंटा नेवाईं।
अनुवाद- पति के मन की बात समझूँ तो सासु का बाल नोंचू।
अर्थ- संगति मिलते ही गलत काम करना।
296. जियते पिया बाती न पूछें,मुअते पिपरवा पानी।
अनुवाद-जीवित रहने पर पिया बात न पूँछे,मरते ही पीपल में पानी।
अर्थ- दिखावा करना।
297.नाया लुगा नौ दिन, लुगरी बरीस दिन।
अनुवाद- नया कपड़ा नौ दिन, फटा-पुराना सालभर।
अर्थ- अपना पुराना ही काम आता है। नया भी कुछ दिन के बाद पुराना हो जाता है।
298. सराहल धिया डोम घरे जाली।
अनुवाद- सराहना की हुई पुत्री ही डोम के घर जाती है।
अर्थ- अत्यधिक बढ़ाई कर देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं।
299. भगवान की घर में देर बा, अंधेर नाहीं।
अनुवाद- भगवान के घर में देर है, अंधेर नहीं।
300. बाहे न बिआ उ बतिए कहा।
अनुवाद- गाभिन हो न बच्चा दे वह बतिया कही जाए।
अर्थ- उम्र बढ़ती ही रहती है।
301.जइसन माई ओइसन धिया, जइसन काकड़ ओइसन बिया।
अनुवाद- जैसी माँ वैसी पुत्री, जैसा काकड़ वैसा बीज।
अर्थ- पुत्री में माँ का गुण होता है।
संकलक-
प्रभाकर पाण्डेय
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
at
5:55 अपराह्न
9
टीका-टिप्पणी
शनिवार, २४ मई २००८
देवरिया जिले के डाकखाने (पोस्ट आफिस) और उनके पिनकोड
यहाँ देवरिया जिले के डाकखाने और उनके पिनकोडों की सूची दी जा रही है। कुछ डाकखाने और उनके पिनकोड छूट गए हैं। कोशिश रहेगी की उनको भी यहाँ जोड़ा जाए। छूटे हुए डाकखाने और उनके पिनकोड जोड़ने में आप लोगों की सहभागिता प्रार्थनीय है।
डाकखाने- पिनकोड
देवरिया सदर 274001
यस बी मार्ग, देवरिया 274001
न्यू कालोनी, देवरिया 274001
रामगुलाम टोला, देवरिया 274001
हनुमान मंदिर, देवरिया 274001
पिपरपाँती 274001
कतरारी 274001
देवरिया मीर 274001
मझगाँवा 274001
लाहिलपार 274001
फुलवरिया लछी/लछी फुलवरिया 274001
सिसवाँ पाण्डेय/सिसवा पांडे 274001
पिपरा चन्द्रभान 274001
परसिया जड्डू 274001
पैकौली महराज 274001
रामपुर अवस्थी 274001
कुसहरी 274001
कंहौली 274001
गरेर 274001
धनौती खुर्द 274001
हाटा बनुआडीह 274001
बरियारपुर 274001
सोनूघाट 274001
नूनखार 274001
बेलवनिया 274001
बतरौली 274001
बैरौना 274001
बढ़या बुजुर्ग 274001
बभनी 274001
भलुअनी 274182
करमटार सेरखान/करमटारी सेरखान 274182
टेकुआ 274182
मरहवाँ/मरहवा 274182
लंगरा बाजार 274182
कोरया/कोरयाँ 274182
ठाकुर देवरिया 274182
गोठा रसूलपुर 274201
कौंतेय नगर 274201
बैतालपुर 274201
छितही बजार 274201
उधोपुर/उधवपुर 274201
बौराडीह तिवारी/ तिवारी के बौराडीह 274201
बटुलहीं/बटुलही 274201
बरपार 274201
बर्दगोनिया 274201
गौरीबाजार 274202
इंदुपुर 274202
करमजीतपुर 274202
कटौरा 274202
खैरा बनुआ 274202
खैरटिया/खैरटियाँ 274202
बेलकुंडा 274202
बखरा खास 274202
सोहसा 274202
सिरजम खास 274202
लेरहा 274202
पथेरहट/पथरहट 274202
लबकनी 274202
चरियाँव बुजुर्ग 274202
साधोपुर 274202
मठिया साहु/मठियाँ साहू 274202
जोगम 274202
जोगिया बुजुर्ग 274204
जोकहाँ खास 274204
पिपरा कछार 274204
तारासरा 274204
करौटा 274204
तिवारी 274204
महिगंज 274204
कोरवा/कोरवाँ 274204
छपौली 274204
जमीरा 274205
नैपुर 274205
नकैल/नकइल 274205
खरेशर 274205
समोगर 274205
चकरवा 274205
बेलापुर 274208
बैदा 274208
बेलवाँ दुबौली/बेलवा दुबौली 274208
नगवाँ खास/नगवा खास 274208
मझहा नरैन/मझहाँ नरैन 274208
पचरूखा 274208
पचलारी 274208
सराँव 274208
एकौना 274208
पथरदेवा 274404
बघरा/बघड़ा 274404
शाहपुर शुक्ल 274404
रामपुर महुआबारी 274404
सकुतई/सकुतईं 274404
पाणेपुर/पाण्डेयपुर 274404
बिसुनपुरा बाजार 274404
बघौचघाट 274404
मेहरहंगपुर 274404
पकहाँ 274404
कोटवा मिसिर/कोटवा मिश्र 274404
बलियवाँ 274405
पिपरा मदन गोपाल 274405
मथुरा छापर 274405
सिधुआ/सिधुआँ 274405
मदरापाली भरत राय 274405
भिखमपुरा 274405
देवरिया बुधू खान 274405
अमेठही/अमेठहीं 274405
मुसहरी 274408
बजराटार महुअवा/बजराटायर महुअवाँ 274408
तरकुलवा 274408
सिरसियाँ गोठा / सिरसिया गोठा 274408
सोहनरिया 274408
सिरसियाँ खोहिआँ/सिरसिया खोहिआ 274408
गढ़ रामपुर/ रामपुर गढ़ 274408
महुआपाटन 274408
पिपराझाम 274408
बैदौली 274501
परसिया मिसिर 274501
पिपरा शुकुल/पिपरा शुक्ल 274501
खुखुंडू 274501
बीजापुर झंतौर 274501
बैकुंठपुर 274501
बरहरा 274501
मझवलिया 274501
मटियारा जगदीश 274502
रावतपार अमेठिया/रावतपार अमेठियाँ 274502
रोहन छपरा 274502
बभनौली पाण्डेय 274502
सुतावर 274502
मेहरौनाघाट/ मेहरवनाघाट 274502
लार 274502
नदौली 274502
बौराडीह 274502
चुरिया 274502
बर्दिहा परशुराम 274505
देवरहा बाबा आश्रम 274505
मलकौली 274505
लार रोड 274505
बगहा 274505
धारमेर 274505
पिपरा मिसिर 274505
पनिका बाजार 274505
चनुकी 274506
भेड़ापाकर/भेरापाकर 274506
कोदरा 274506
पयासी 274506
महुजा 274506
मझौली राज 274506
बनकटा मिसिर/बनकटा मिश्र 274506
खेमा देई 274508
खरवनिया 274508
बरठी 274509
बकुची 274509
बेलापुर 274509
चेरो 274509
चकरवा बहोरदास 274509
चोरडिहाँ 274509
शामपुर 274509
डोल छपरा 274509
डुमवलिया 274509
इटहुआ चंदौली 274509
पिपरा रामधार 274509
रामपुर बुजुर्ग 274509
सलेमपुर 274509
सोहंग 274509
तुलसीबारा 274509
थेंगवल दुबे 274509
परसिया देवार 274601
सोनारी 274601
भैदवाँ/भैदवा 274601
बरकागाँव 274601
बरहज 274601
मरकरा 274601
नवापार 274601
नेमा 274602
टकिया/ टकियाँ 274602
देवसिया 274602
नरियाँव 274602
भागलपुर 274602
भुलईपुर 274603
बारा दीक्षित 274603
महेन 274603
कोटपुर पिपरा 274603
बिसुनपुरा देवार 274603
कपरवार 274603
खोरी 274603
करजहाँ 274603
गौरा जयनगर/गउरा जैनगर 274603
करैल शुक्ल/करायल शुक्ल/करायल शुकुल 274603
सतरावँ 274604
तेलिया कलाँ 274604
धौला पंडित 274604
अंडिला 274604
पैना 274604
गरुअना 274604
टिकार 274604
कसिली 274604
बेलवा बाबू/बेलवाँ बाबू 274701
भटनी 274701
नोनापार 274701
पड़री बाजार 274701
पिपरा दीक्षित 274701
सिसवाँ/सिसवा 274701
पेओकोल/पिकोल 274701
रामपुर खोराबारी/खोराबारी रामपुर 274701
भथुआ तिवारी 274702
खामपार 274702
पकड़ी बाबू 274702
भेंगारी बाजार 274702
सरया/सरयाँ 274702
सवरेंजी 274702
टिकमपार 274702
कोठिलवा/कोठिलवाँ 274702
कुकुर घाँटी 274702
मरीपार 274702
बनकटा अमेठिया 274702
पिपरा उत्तर-पट्टी 274702
बड़का गाँव 274702
अहिरौली बघेल 274702
बहिआरी बघेल 274702
भाटपार रानी 274702
बंकुल 274703
बनसोपट्टी 274703
रहीमपुर 274703
भवानी छापर 274703
भोपतपुरा 274703
खुरवसिआ 274703
परतापपुर/प्रतापपुर 274703
परसिया छितनी सिंह 274704
इंगुरी बाजार 274704
सोहनपुर 274704
रायबारी 274705
बलुआ अफगान 274705
घाँटी 274705
पिपरा बिठल २७४७०५
_________________________________________________
द्नारा प्रेषित
प्रभाकर पाण्डेय
at
5:49 अपराह्न
5
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