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रविवार, 25 सितंबर 2016

गाँव (देवरिया जिला) की पाठशाला (भाग-1)

चित्र- साभार जागरण
याद है मुझे, जी हाँ! अच्छी तरह याद है। वैसे भी जीवन के, बचपन के उन अविस्मरणीय समय को मैं क्या, कोई भी नहीं भूल सकता। बोरा, बस्ता और पटरी उठाकर उस समय हम निकल जाते थे गाँव के प्राइमरी की ओर। गाँव में प्राइमरी स्कूल तो था, पढ़ाने वाले पंडीजी भी थे पर यह पता नहीं होता था कि आज स्कूल कहाँ लगनेवाला है, क्योंकि स्कूल की जमीन होते हुए भी स्कूल का भवन तो था नहीं। जहाँ स्कूल की जमीन थी, वहाँ कुछ लोग अस्थायी खलिहान बना लेते थे या कुछ महिलाएँ उस जमीन पर गोबर पाथते हुए (जलावन के लिए) नजर आ जाती थीं। एक हप्ते कभी श्री दसरथ सिंह के बगीचे में तो कभी-कभी कई महीनों तक श्री रामदास यादव के खलिहान में हमारा स्कूल लगता था। कभी-कभी तो अत्यधिक धूप से बचने के लिए हमारा स्कूल इस बगीचे से उस बगीचे की सैर किया करता था। बारिस के सीजन में हम बच्चों की चाँदी रहती थी, क्योंकि कभी-कभी तो किसी की मड़ई-पलानी में स्कूल लग जाता था पर जोरदार बारिस में स्कूल अधिकतर बंद ही रहता था। वैसे भी स्कूल में था क्या, एक टूटी कुरसी, वह भी गाँव के किसी सज्जन ने पंडीजी को बैठने के लिए दे दिया था। हाँ एक चीज जो स्कूल की अपनी थी, वह था पटरा (श्यामपट्ट)। प्रतिदिन हमलोग भंगरई (भेंगराई) लाते थे और श्यामपट्ट को चमकाते थे। पंडीजी इस श्यामपट्ट (पटरे) पर जोड़-घटाना, गुणा-भाग सिखाते थे।
पंडीजी के आने से पहले ही मानिटर की देख-रेख में स्कूल शुरू होने के पहले हम लोग अपना-अपना बोरा निकालते थे और एक साथ सभी मिलकर (बोरे के एक कोने को हाथ से पकड़कर और उस हाथ को अपने दोनों बाजू में घुमाते हुए पीछे बड़ते थे) एक दिशा में बढ़ते हुए जमीन की साफ-सफाई करते थे, फिर हमलोग बैठने के लिए अपना-अपना बोरा बिछाते थे और मास्टर साहब (पंडीजी) के आने का इंतजार करते थे। ज्योंही पंडीजी हमें कच्ची सड़क से बगीचे की ओर अपनी टूटही साइकिल को मोड़ते हुए दिखते थे, हम सभी लोग चुपचाप सावधानीपूर्वक अपनी जगह पर बैठ जाते थे और पंडीजी के साइकिल खड़ा करते ही उनके आदरार्थ अपनी जगह पर खड़ा हो जाते थे। फिर क्या मानिटर लाइन लगवाता था और प्रार्थना शुरू हो जाती थी, हे प्रभो! आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए...... प्रार्थना के बाद फिर हम सभी बच्चे अपने-अपने बोरे पर आकर बैठ जाते थे और पंडीजी के बताए अनुसार अपनी पटरी पर लिखना शुरू कर देते थे।
दोपहर में खाना खाने की छुट्टी होती थी, क्योंकि उस समय न सरकार द्वारा मध्यान्न भोजन दिया जाता था और न ही आज की तरह हम लोग टिफिन ही लेकर स्कूल में जाते थे। दोपहर की छुट्टी की घंटी लगते ही हम सभी बच्चे अपने बोरों से अपनी पटरी आदि को ढंक कर लंक लगाकर अपने-अपने घर की ओर भागने लगते थे। उस समय खूब चिल्ल-पौं मच जाती थी और पंडीजी चाहकर भी हम बच्चों को शांत नहीं रख पाते थे। देखते ही देखते स्कूल की जगह पूरी तरह खाली। बस रह जाते थे तो टूटी कुर्सी पर बैठे हुए पंडीजी और उनकी किसी पेड़ के सहारे खड़ी साइकिल। हाँ कभी-कभी गाँव का कोई मनई दोपहर के समय पंडीजी से बात करते हुए उनके अकेलेपन को दूर करने की कोशिश करता था या कभी-कभी पंडीजी ही दोपहर की छुट्टी होते ही अपनी साइकिल डुगराते हुए गाँव के बाहर के किसी के घर पर आ जाते थे और उसके दरवाजे पर बैठ जाते थे, घर वालों से उनकी सुनते और अपनी सुनाते, इस प्रकार उनकी दुपहरी कट जाती थी।
घरवालों की डाँट-डपट के बाद हम कुछ बच्चे लगभग 2 बजे फिर स्कूल में जमा हो जाते थे। खैर दोपहर के बाद हमारी पढ़ाई विशेषकर गोल में होती थी और पढ़ाने वाले विशेषकर तेज बच्चे ही हुआ करते थे। क्योंकि दोपहर बाद पंडीजी कुर्सी पर बैठे हुए बस बच्चों पर नजर रखते थे और उन्हें पढ़ने-पढ़ाने के लिए तेज या यूं कह लें बड़ी कक्षा के बच्चों को निर्देशित करते थे। कभी-कभी तो कक्षा 2 से लेकर 5 तक के बच्चों को एक साथ गोलंबर (गोल रूप में) में बिठाकर गिनती या पहाड़ा पढ़ाने का काम शुरू हो जाता था। जैसे सभी बच्चे गोलंबर में बैठ जाते थे और एक बच्चा उन सबके पीछे घूमते हुए जोर-जोर से दुक्के दु, दु दुनी चार.....बोलता और फिर सभी बच्चे उसे दुहराते। जो बच्चा तेज नहीं बोलता उसे पंडीजी बाँस की कोइन से मारते या पहाड़ा पढ़ाने वाला बच्चा ही धम्म से उसकी पीठ पर मुकियाकर आगे बढ़ जाता। एक अलग ही आनंद। हाँ एक बात और बताना चाहूँगा, दोपहर के बाद स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या थोड़ी कम हो जाती। कोई बच्चा बहाना बना जाता तो कोई, बकरी, गाय-भैंस आदि चराने निकल पड़ता। इतना ही नहीं कुछ बच्चे घाँस आदि काटने तो कुछ अपने घरवालों की मदद के लिए स्कूल नहीं आते।
फिर चार बजते ही स्कूल की घंटी टनटनाती और हम सभी बच्चे अपना बस्ता, बोरा और पटरी उठाए घर की ओर दौड़ जाते। उस समय कोई किसी को नहीं पहचानता और सिर्फ उसे अपना घर ही दिखाई देता। एक बार 4 बजे छुट्टी की घंटी लगने के बाद पंडीजी क्या, अगर पूरा गाँव भी इकट्ठा होकर चाहे बच्चों को रोक ले तो संभव नहीं था। बच्चे तीर की तरह निकलकर घर पहुँचना चाहते थे।.....जारी (अगले अंक में......)

-पं. प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया

सोमवार, 20 जून 2016

लंठाधिराज ‘नेता काका’

क्या जानते हैं आप नेता काका के बारे में? नहीं जानते? कोई बात नहीं, मैं बताने जा रहा हूँ आपको नेता काका के बारे में। पूरा परिचित करवाऊँगा आपको उनसे। मैं यह तो नहीं कह सकता कि उनकी कहानी सुनकर आप हँस पड़ेंगे पर इस बात की गारंटी देता हूँ कि उनके बारे में जानकर आप मुस्काए बिना नहीं रह सकते और इतना ही नहीं आपको जब-जब नेता काका याद आएंगे (याद आएंगे नहीं, आएंगे ही!) आप अपनी मंद-मंद मुस्कान को रोक नहीं पाएंगे। अगर गाँव-जवार में लंठों के लिए कोई पदवी, उपाधि होती, जैसे कि ‘लंठाधिराज’, ‘श्री श्री महा लंठाधिराज’ आदि तो हर साल इसे जरूर नेता काका ही जीतते और जीतते क्यों नहीं, हर साल वे जो अपनी नई-नई लंठई द्वारा सुर्खियों में बने रहते हुए लोगों के चेहरों पर गुस्सा मिश्रित हँसी का संचार कर जाते हैं।
गोल-मटोल शरीर, मध्यम कद-काठी, गौर वर्ण, चेहरे पर सदा तैरती हल्की सी गंभीर मुस्कान के धनी नेता काका के घुंघराले छोटे-छोटे पर पूरे बाल भी शायद बचपन से ही श्वेत वर्ण के हैं और आज भी अपनी चमक को बरकरार रखे हुए हैं। किसी गंभीर बात को भी हँसी में बदल देने वाले नेता काका सामने वालों को हँसने पर तो मजबूर कर देते हैं पर उनके चेहरे की गंभीरता पर उस हास्य का कोई असर नहीं दिखता, हाँ कभी-कभी मंद मुस्कान उनकी श्वेत बतीसी की हल्की झलक, बदली में लुका-छिपी का खेल खेलते चंद्र-सूर्य की भाँति प्रकट कर जाती है।
नेता काका का असली नाम क्या है, मुझे क्या, शायद अधिकांश गाँववालों को भी पता नहीं। शायद इसका कारण यह है कि नेता काका का यही नाम (नेता) सुनने से गंभीर चेहरे पर भी एक मुस्कान जो तैर जाती है, रोता हुआ बच्चा भी ‘नेता काका’ शब्द का उच्चारण कहीं से भी कान में पड़ते ही हँस उठता है इसलिए कोई उनका असली नाम जानने की कोशिश नहीं करता। और साथ ही जबसे मैंने होश संभाला है, पाया है कि गाँव-जवार, हित-नात भी सभी उन्हें नेता-नेता ही कहकर बुलाते आ रहे हैं। कुछ लोग बताते हैं कि एक बार विधायकी के चुनाव में नेता काका खमेसर शुकुल का प्रचार कर रहे थे, उनकी गाड़ियों में घूम-घूमकर, माइक में चिल्ला-चिल्लाकर खमेसर शुकुल को ओट देने के लिए जनता से अनुरोध करते। पर एक बार खमेसर शुकुल ने खुद ही अपनी नंगी आँखों से उन्हें विपक्षी उम्मीदवार मटेसर पाणे की गाड़ी पर घूमते हुए और उनका जय-जयकारा लगाते हुए देख लिया था। फिर क्या था, खमेसर शुकुल नेता काका को बुलवाए और साक्षात दंडवत करते हुए धरती पर लोट गए तथा हाथ जोड़कर बोले कि आप ही वास्तव में नेता हो, हम लोग आपके आगे फेल हैं, जीरो हैं। कहा जाता है कि तभी से नेता काका ‘नेता-नेता’ कहे जाने लगे। इतना ही नहीं, वैसे भी नेता काका को बराबर टिनोपलहिया कुर्ता-पाजामा-गमछा में ही देखा जाता है, शायद इस कारण भी वे नेता कहलाते हैं।
 आइए, आपको इनकी एक पुरानी नेतागीरीपूर्ण हास्य घटना सुना देता हूँ। एक बार नेता काका कुछ काम से गाँव से 50-60 किमी दूर मडरौना नामक एक शहर में गए थे। वहाँ जिला स्तरीय फुटबाल मैच का उद्घाटन होने वाला था और उद्घाटन के लिए जिला-शहर देवरिया से एक युवा नेता आने वाले थे। जिला-शहर देवरिया से मडरोना की दूरी लगभग 80 किमी है। लोग-बाग बेसब्री से मैच शुरू होने का इंतजार कर रहे थे पर उद्घाटन के बाद ही मैच शुरू होना था। नेता काका को वहाँ किसी से जानकारी मिली कि उद्घाटन के लिए जो नेता आने वाला है, वह एकदम नया है और इस इलाके में पहली बार आ रहा है, इसलिए यहाँ उपस्थित लोग उसे पहचानते नहीं, और जो 2-3 लोग पहचानते हैं, वे ही उसकी अगुआई करने के लिए, उसे लाने के लिए देवरिया (जिला-शहर) गए हैं। संयोग देखिए कि नेता काका उस युवा नेता से लखनऊ में मिल चुके थे और उसे जानते थे। अब नेता काका की मनबढ़ई रंग लाई, वे चुपके से अपने एक दोस्त के घर पर गए, वहाँ से कुर्ता-पाजामा पहने अपने 3-4 परिचितों को लिए और एक दोस्त की जीप पर सवार होकर फुटबाल मैदान में पहुँच गए। नेता काका वैसे भी नेता तो लग ही रहे थे और साथ ही उनकी जीप पर कुछ फूल-माला भी टंगा था, फिर क्या था, आयोजकों से बोले कि वे देवरिया से तरकुलवा एक सभा में चले गए थे और वहीं से सीधे यहाँ आ रहे हैं। उस समय किसी के पास मोबाइल आदि तो था नहीं और वैसे भी मैच उद्धाटन में देरी हो रही थी। फिर क्या था, नेता काका गंभीर मुद्रा बनाए फीता काटकर मैच का उद्धाटन कर दिए, मिठाई-उठाई बँट गई, मैच भी शुरू हो गया, फिर कुछ जरूरी काम का बहाना बनाकर नेता काका, अपने दोस्तों के साथ खिसक लिए। इधर मैच शुरू होने के लगभग 20-25 मिनट बाद असली नेता (मतलब जो उद्धाटन करने आने वाला था) वहाँ पहुँचा पर वह और उसे लेकर आने वाले तो दंग रह गए क्योंकि उन्होंने देखा कि फीता-ऊता तो पहले ही कट गया है और मैच भी शुरू हो गया है। फिर क्या था, आयोजक मंडली गुस्से में लाल होकर लगी नेता काका को खोजने पर नेता काका कहाँ मिलने वाले थे, वे तो अपने गाँव आने वाली बस में सवार होकर गाँव की ओर निकल चुके थे। नेता काका से कुछ दोस्तों ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो कहने लगे कि वह नेता पता नहीं कब आता, फिर फीता काटता, फिर मैच शुरू होता! मुझसे दर्शकों की परेशानी देखी नहीं गई और अगर वह नेता भी आता तो फीता ही तो काटता, तो मैंने काट दिया तो क्या गुनाह कर दिया।
मेरे गाँव के दो और लंठाधिराज
आइए, अब आप लोगों को नेता काका के लड़कपन में लिए चलता हूँ। नेता काका जब प्राइमरी में पढ़ते थे तो स्कूल से बहुत ही बंक मारते थे। गाँव से स्कूल जाते समय किसी बगीचे आदि में रूक जाते और अपने कुछ सहपाठियों के साथ गँवई खेल कबड्डी, ओल्हा-पाती आदि खेलने में मस्त हो जाते। एक बार की बात है कि नेता काका स्कूल जाने के लिए कुछ दोस्तों के साथ निकले पर एक बगीचे में लगे ओल्हा-पाती खेलने। उसी दौरान उनके गाँव का एक व्यक्ति उसी रास्ते से होकर बाजार जा रहा था। उसने इन लोगों को उस बगीचे में खेलते देखा। उसे लगा कि शायद अभी स्कूल खुलने में समय होगा इस लिए गाँव के ये बच्चे यहाँ खेल रहे हैं। पर यह क्या, 2-3 घंटे बाद जब वह बाजार करके उसी रास्ते से घर लौटा तो क्या देखता है कि बच्चे तो स्कूल न जाकर अभी भी खेलने में मशगूल हैं। वह तेज साइकिल दौड़ता हुआ अपने घर न जाकर पहले नेता काका के घर गया और उनके बड़े भाई को सारी बात बता दी। नेता काका के भाई, बहुत गुस्सैल, वे लाठी उठाए और सीधे उस बगीचे में पहुँचे। नेता काका को देखते ही वे लाठी तान दिए, अभी वे लाठी से प्रहार करें इसके पहले ही नेता काका गंभीर मुद्रा बनाकर बोल पड़े, “भइया! शांत हो जाइए। हम लोग स्कूल गए थे पर स्कूल में छुट्टी हो गई, क्योंकि प्रिंसपल साहब की माँ मर गई हैं।” नेता काका की यह बात सुनकर उनके बड़े भाई थोड़े शांत तो हुए पर उन्हें नेता काका की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, वे दूसरे लड़कों के तरफ घुमे और सच्चाई जाननी चाही। मार का डर किसे नहीं डराता। बच्चों ने भी नेता काका के हाँ में हाँ मिला दी। पर नेता काका के बड़े भाई भी कहाँ चुप रहने वाले थे। वे दूसरे दिन सुबह-सुबह नेता काका को लेकर उनके स्कूल पर पहुँच गए। स्कूल पर पहुँचकर वे सीधे प्रिंसपल से मिले और एक दिन पहले (बीते कल) वाली घटना सुना दी। प्रिंसपल तो पूरी तरह से गुस्से में आ गया, क्योंकि बच्चों के छुट्टी (बंक) मारने से उसे उतना गुस्सा नहीं आया, जितना इस बहाने से की बच्चों ने उसकी ही माँ को मार दिया। अब क्या था, प्रिंसपल ने डंडा उठाया और नेताकाका एवं उनके साथ बंक मारने वाले सहपाठियों को खूब धोया। पर संयोग भी अजीब चीज है। प्रिंसपल साहब की माँ 5-6 दिनों से बीमार चल रही थीं और जिस दिन नेता काका की पिटाई हुई उसी दिन रात को वे स्वर्ग सिधार गईं। अपनी माँ का क्रिया-कर्म करके कुछ हप्तों के बाद जब प्रिंसपल साहब स्कूल आए तो सबसे पहले नेता काका को बुलाए और हाथ जोड़कर बोले की नेता तुम जितना चाहो बंक मारो पर किसी के माँ-बाप आदि को मत मारो।
आइए, अब मेरे हिसाब से नेता काका का सबसे दमदार खिस्सा सुनिए। एक बार की बात है कि नेता काका गाँव की कुछ बुजुर्ग महिलाओं (अपनी माँ, काकी आदि) को लेकर इलाहाबाद नहान (धार्मिक दृष्टि से किसी पर्व पर किया जाने वाला स्नान आदि जैसे कुंभ आदि) कराने निकले। वे देवरिया आकर सभी महिलाओं को बरहजिया ट्रेन में बिठाकर बरहज (एक धार्मिक शहर) पहुँच गए। फिर नदी किनारे पहुँचकर उन महिलाओं से बोले कि इलाहाबाद संगम आ गया, आप लोग अब बिना देर किए नहान कर लीजिए। उसमें से अधिकांश महिलाएँ बहुत बार इलाहाबाद गई थीं, उन्हें थोड़ा अजीब लग रहा था कि जिस इलाहाबाद पहुँचने में दसेक (10-12) घंटे लगते हैं, उस इलाहाबाद में हम लोग 2-3 घंटे में ही कैसे पहुँच गए? साथ ही उन्हें इलाहाबाद जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। एक महिला बोल पड़ी की ए नेता, बड़का पुलवा तो नहीं दिख रहा है और ना ही भीड़-भाड़ ही है साथ ही इतना जल्दी हम लोग कैसे पहुँच गए? उस बुजुर्ग महिला की बात सुनते ही नेता काका गंभीर हो गए और बोल पड़े, “काकी! आपको पता नहीं है, बहुत बाढ़ आ गई थी, इससे वह पुल तथा साथ ही कितने साधु-संन्यासियों के टेंट आदि गंगाजी में दह गए। और इतना ही नहीं इस बार यह नहान कही जगह लगा है और साथ ही भिनसहरे (अति सुबह) का ही नहान था इसलिए बहुत सारे लोग नहा कर जा चुके हैं। वैसे भी संगम पर नागा साधुओं का स्नान है, इसलिए मैं आप लोगों को लेकर उधर नहीं जा सकता, इधर ही नहाना पड़ेगा।” इसके बाद थोड़ा गुस्सा होकर बोले, “आप लोगों को तो देश दुनिया की खबर रखनी नहीं है। हम लोग जिस ट्रेन से आए वह विशेषकर इस नहान के लिए ही चलाई गई है और उसकी स्पीड अन्य ट्रेनों की तुलना में चौगुना है, इसलिए हम लोग फटाफट पहुँच गए।” इसके बाद थोड़ा धीरा होकर कहने लगे कि पिछली बातों को भूल जाइए और फटाफट नहा लीजिए नहीं तो नहान का समय निकल जाएगा और हम लोगों का आना व्यर्थ जाएगा। फिर क्या था, सभी बुजुर्ग महिलाएँ वहीं स्नान, पूजा-पाठ कीं और फिर घर आ गईं। जय हिंद।

पं. प्रभाकर गोपालपुरिया
9892448922