शनिवार, 25 नवंबर 2006

चलें गाँव की ओर (अपनी बात)

जय राम जी की, पाठक महानुभाओं ।

प्रभाकर गोपालपुरिया, एक नया चिट्ठा " चलें गाँव की ओर" लेकर प्रस्तुत है । इस चिट्ठे के माध्यम से विशेषकर अपने जनपद देवरिया (उत्तरप्रदेश) के गँवई लोकरंग को दर्शाने एवं ग्रामीण झनकार या कहें भोजपुरी झनकार को आप महानुभाओं तक पहुँचाने की कोशिश की जायेगी ।

देवरिया (Deoria) :- आइए, पहले "देवरिया" को जानने की कोशिश करें । देवरिया यानि देवताओं का एरिया (क्षेत्र) । परिभाषा थोड़ी अटपटी लग रही है क्या ? अरे भाई ! बिल्कुल नहीं । क्योंकि अपनी जो हिन्दी है न , उसमें किसी भी भाषा के शब्द को अपने में समाहित करने की शक्ति है क्योकि शब्द तो ब्रह्म है और ब्रह्म ब्रह्म में समाहित है । अपने देश को ही लें जिसकी पहचान है, अनेकता में एकता । सदियों से अपनी संस्कृति, अपने संपर्क में आनेवाली प्रत्येक संस्कृति को अपने में समाहित कर लेती है । हजारों शब्द आपको हिन्दी में मिल जाएँगे जो अलग-अलग भाषा के शब्दों से मिलकर बने हैं । उदाहरण के तौर पर देखें तो लाठीचार्ज, जो समय-समय पर अपनी सरकार कराती रहती है । तो जी हाँ, मुद्दे पर आते हैं जैसे 'लाठीचार्ज' बना वैसे ही बन गया 'देवरिया'

दरअसल मुझे लगता है कि यह नाम कोई ईश्वर भक्त अंग्रेज ने दिया होगा । जब उसने इस क्षेत्र का दौरा किया होगा तो हर जगह, हर गाँव में उसे काली माई, भवानी माई, बेलही भवानी, बरमबाबा, डिहुआर बाबा (डिह बाबा), नेटुआबीर बाबा (अवश्य नेटुआ होंगे या नेटुआ जाति (अनुसूचित) द्वारा पूजे जाते होंगें), जनहरी बाबा आदि ग्राम देवियों एवं देवताओं के थान (मंदिर या पिंडी) या शाम को किसी गाँव में बारात निकलते समय दूलहे और उसकी माँ को किसी कुएँ, देवथान आदि की परिक्रमा करते हुए देखा होगा और बरबस उसके मुँह से निकल गया होगा देवरिया

कुछ विद्वान 'देवरिया' की उत्पत्ति 'देवारण्य' या 'देवपुरिया' से मानते हैं ।

जनपद की बोली भोजपुरी :- भोजपुरी केवल बोली ही नहीं अपितु देवरिया की जनता के दिल की आवाज़ है, उनका जीवन है और है उनका घर-संसार । भोजपुरी उनके कामों में, उनके व्यवहारों में एवं उनके पहनावों में झलकती है ।

खैर भोजपुरी तो वह बोली (
तबतक भाषा नहीं कहुँगा जबतक सरकार द्वारा इसको यह अधिकार न मिल जाए) है जो बहरा भी सुन लेता है और गूँगा भी बोल लेता है । इसमें सरलता एवं सहजता की मिठास है और हैं हृदय को झंकृत कर देने वाले मीठे एवं कर्णप्रिय शब्द । भोजपुरी बोली हो या क्षेत्र हो या हो भोजपुरिया मनई, सब तो प्रेम के भूखे हैं, सबको मिला लेते हैं और सब में घुलमिल जाते हैं । भोजपुरी की सरलता और मधुरता का कारण है सबको पूर्णता प्रदान करना । यह प्रत्येक क्षेत्र में अपूर्ण को संपूर्ण में बदलने की क्षमता रखती है ।इसके सभी शब्द पूर्ण हैं और जो पूर्ण नहीं हैं वे पूर्ण हो जाते हैं । जैसे :- रामकृष्ण- रामकिसुन, ब्रह्मा पाण्डेय- बरमहा पाणे, लक्ष्मी माई- लक्षमी माई, रामानंद- रामानन, विष्णु- बिसनु, ईश्वर- ईसवर, कम्प्यूटर- कमपूटर और डाक्टर (कुछ अंग्रेजी के जानकार लोग उच्चारण के आधार पर डॉक्टर लिखते हैं जिससे मेरा सहमत होना आवश्यक नहीं है)- डाकटर हो जाता है ।
इस बोली की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है मात्राओं का कम से कम प्रयोग । जैसे :- पैसा- पइसा /पयसा, जैसा- जइसा, मौसी- मउसी, चौका- चउका (ै =इ तथा ौ = उ) ।

बाप-दादों की सुने तो देवरिया, देउरियाँ हो जाता है । इस देउरियाँ से एक और बात दिमाग में कौंधी और वह यह है कि हमारे क्षेत्र की गँवई जनता अधिकतर वा,या () से समाप्त होने वाले शब्दों को अनुस्वार के साथ उच्चारित करती है, जैसे:- पथरदेवा को पथरदेवाँ (एक छोटा शहर जो हमारा पोस्ट है, अब यहाँ यह मत कहिएगा कि अवश्य यहाँ पत्थरों की बहुत पूजा होती होगी), तरकुलवा को तरकुलवाँ (एक छोटा शहर शायद तरकुल के पेड़ों की अधिकता के कारण यह नाम पड़ा हो) ,मदरिया को मदरियाँ (एक गाँव), सोचना को सोंचना, नोचना को नोंचना इत्यादि ।

2 टिप्‍पणियां:

सुनील डोगरा........ज़ालिम ने कहा…

समझ नहीं आ रहा है कि‍ क्‍या प्रति‍क्रि‍या दूं।

श्रेष्‍ठतम्

प्रेमलता पांडे ने कहा…

बधाई!बधाई!बधाई!