बुधवार, 6 अगस्त 2008

नाग पंचमी : देवरिया जनपद में

[नागपंचमी भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न तरीकों से मनाई जाती है। पर साँप (नाग बाबा-नेताबाबा-सफेदपोश बाबा और बाबा) को दूध पूरा भारतीय जनमानस सदियों से पिलाता आ रहा है और इस त्योहार में भी ये ही एकरूप है।]
आइए, हम आप को नागपंचमी त्योहार के शुभ अवसर पर देवरिया लिए चलते हैं ताकि आप देख सकें कि इस जनपद की ग्रामीण जनता नागबाबा को दूध पिलाने के साथ-साथ और क्या-क्या करती है।
नागपंचमी के दिन बहुत जल्दी जगना पड़ता है। बहुत सारे लोग-लइका तो भिनसारे ही जग जाते हैं। वैसे ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को छोड़कर बाकी सभी लोग बहुत ही जल्दी जग जाते हैं। किसी को गाय-बैल को सानी-पानी करना होता है तो
किसी को हल-बैल लेकर खेतों में जाना होता है।
इस दिन जल्दी जगने से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि गाय का दूध आसानी से मिल जाता है और इस दिन दूध की व्यवस्था विशेषकर घर के बच्चे ही करते हैं। बच्चे नागपंचमी के एक दिन पहले ही पता लगा लेते हैं कि गाँव में किसके-किसके घर लगहर (दूध देनेवाली) गाय है और नागपंचमी के दिन बहुत सुबह ही - लोटा-गिलास लेकर दूध लाने निकल पड़ते हैं और जिसके-जिसके घर पर लगहर गाय होती है उनके-उनके घर पर एक-एक बरतन रख देते हैं।इस दिन लोग गाय का दूध बेचते नहीं अपितु थोड़ा-थोड़ा कर के सभी को दे देते हैं। और अब आप समझ ही गए होंगे कि अगर - जगह से १०० -१०० ग्राम दूध भी मिल जाता है तो दूध-लावा चढ़ाने के लिए पर्याप्त होता है।
दूध की व्यवस्था करने के बाद एक थाली में गाय के गोबर को बालू और सरसों से किसी पंडित या जानकार व्यक्ति द्वारा परोरवाया (अभिमंत्रित) जाता है। और इसी गोबर से घरों में जगह-जगह नागबाबा के चिह्न बनाए जाते हैं और पूरे घर पर लाइन खींची जाती है।
औरतें जल्दी-जल्दी नहा-धोकर धान का लावा बनाती हैं और घर में गोबर द्वारा बनाए हुए नागबाबा के चिह्नों पर दूध और लावा चढ़ाती हैं। इसके बाद घर का ही कोई व्यक्ति दूध में लावा मिलाकर गाँव के सभी देवलों (देव-स्थानों), सभी खेतों, बगीचों आदि में चढ़ाता है।
इस दिन घर में तरह-तरह के पकवान जैसे खीर-पूड़ी आदि भी बनाई जाती है। १०-११ बजे गाँव के सभी लोग-लइका किसी बगीचे या मैदान में इकट्ठा होते हैं और शुरु होते हैं तरह-तरह के खेल; जैसे- कबड्डी, घोड़-कबड्डी, लंबी कूद, ऊँची कूद, चौपड़िया, चिक्का, दौड़, कबड्डी, कुश्ती आदि। इन खेलों में भाग लेना बहुत ही आनन्ददायक और यादगार होता है क्योंकि इसमें बाप-दादा सभी लोग भाग लेते हैं। एक बात और जो मुझे आज भी याद है और सदा-सदा याद रहेगी वह यह कि इन खेलों में बहुत बड़े पैमाने पर गलगोदही (खेल के नियम न मानना या झूठ बोलना) होती है और जिसके कारण कोई खिलाड़ी जल्दी मरता नहीं है और खेल घंटों तक चलता रहता है।
खेल खेलने के बाद सभी लोग घर पर आते हैं और पकवानों का आनन्द उठाते हैं।

-प्रभाकर पाण्डेय

15 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

सबकुछ याद आ गया. बिल्कुल ऐसे ही मनाया जाता है हमारे गाँव में भी. हमलोग पचैयाँ बोलते थे. बहुत सुंदर जानकारी दी है आपने.

अशोक पाण्डेय ने कहा…

नागपंचमी की शुभकामनाएं और ब्‍लॉगजगत में इसकी चर्चा करने के लिए धन्‍यवाद।
हमारे इलाके में भी इसे पचैयां ही कहा जाता है। लेकिन हमारे यहां इस त्‍योहार के दिन झूला खेलने का चलन है। महिलाएं व बच्‍चे विशेष रूप से झूला का आनंद लेते हैं। हर घर में पकवान बनता है और लोग नये-नये कपड़े पहनते हैं। हालांकि अब इस त्‍योहार को लेकर पहले वाली उमंग लोगों में नहीं रही। पेड़ों के कटते जाने के साथ झूला खेलने का रिवाज भी लुप्‍त होते जा रहा है।

चौराहा ने कहा…

लगता है आज़मगढ़ और देवरिया की नागपंचमी (ठेठ में पचइयां)एक जैसी ही है बस दो चीज़ छूट गई। एक तो कोई गांव ऐसा नहीं होता हमारे यहां जहां कुश्ती का दंगल न हो। और दूसरी है कहीं-कहीं बुलबुल की लड़ाई। वो भी बाकायदा ईनाम रखकर। पर इतना सब कुछ आपने याद दिलाया वो भी कम नहीं है। और हां झूला हर घर में पड़ता है। हम तो देसी पचइंया भूल ही गए थे।

अफ़लातून ने कहा…

तुलसीदास जब सनातनियों से त्रस्त थे (संस्कृत में ही रामायण होनी चाहिए) तब उन्होंने अखाड़े बनाए।आज के दिन(यहाँ भी पंचैय्या,पंचमी से) काशी के अखाड़ों में कुश्ती होती है । सुबह से बच्चे .'छोटे गुरु का बड़े गुर का नाग लो ,भाई नाग लोग ' कह कर नाग के चित्र बेचते हैं। दूध जरूर चालीस रुपए लीटर था,मुफ़्त नहीं।

अखिलेश सिंह ने कहा…

मुंबई में भी सागर किनारे (जूहू, चौपाटी) युवाओं को आज के दिन चिक्का, कबड्डी आदि खेलते हुए देखा जा सकता है जो ग्रामीण परंपरा का निर्वाह महानगरों में रहते हुए भी उमंग के साथ करते हैं।
हमलोग भी यहाँ (हमारे परिचित) आज एक पास एकत्र होकर इन गँवई खेलों का आनन्द लेने की कोशिश करते हैं।

Udan Tashtari ने कहा…

इस पर्व पर आपको बधाई एवं शुभकामनाऐं.

siddharth ने कहा…

पंडित जी, एक महत्वपूर्ण आइटम छूट गया है। पुतरी दहवाने और पीटने वाला। गाँव की सभी लड़कियाँ शाम को सज-धजकर किसी प्राकृतिक जल-श्रोत के किनारे इकठ्ठा होती हैं। सबके पास कपड़े की बनायी हुई पुतरी(गुड़िया)होती है। उनके साथ उनके भाइयों के हाथ में हरे बाँस या अन्य लकड़ी के सजाये हुए डण्डे होते हैं। लड़कियाँ गीतों के बीच सजी-धजी पुतरियाँ पानी में फेंकती हैं और लड़के उनको(गुड़ियों को) डण्डे से पीटते हैं। पानी में गिर जाते हैं, खूब हँसी होती है।

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

मेरी वधाई और शुभकामनाएं सबको. प्रभाकर जी, बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने. धन्यवाद.

u.p singh ने कहा…

raaoor lekh ke bare mein ham ka kahin chun-chun ke internet pe sajawatani..bahut niman lagal

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

yah nagpsnchsmi zammak zam yah dhol dhamaka dhammak dham. bachpan men padhi huee ye kawita yad aa gaee. Aapko nagpanchami ki bahut bahut Shubh kamnaen. Dewariya men bhi ghar ghar men nagwale aate honge nag baba ki pooja karane ko.

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

शुभकामनाएं पूरे देश और दुनिया को
उनको भी इनको भी आपको भी दोस्तों

स्वतन्त्रता दिवस मुबारक हो

badiya lekh
par maine der se pada
khair.....
Naagpanchmi badiya hi mani hogi...

Abhishek Tiwari ने कहा…

Kamal ka likhte hai, bahut acha kaam kar rahe hai mujhe acha laga apna desh apni duniya dekh kar, aap ko ye pryaas karte rahana chahiye taki puri duniya hamare baare main jaan sake

SHRI SIDDHESHWAR NATH SHIV MANDIR TRUST ने कहा…

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Hariom mishra ने कहा…

prabhakar ji kuchh dugdeswar nath mandir ke bare me likhiye taki uanake bare me logo ko malum ho

Click2Pay casino ने कहा…

Remarkable phrase